- बोले किसान, खेतों में बारिश का पानी भर जाने से बढ़ा रोग का प्रकोप
संवाद न्यूज एजेंसी
हरिहरपुर। बीते सितंबर महीने के अंत में तेज हवा के साथ हुई बारिश से धान की फसलें काफी प्रभावित हुई हैं।जिसके चलते अगेती धान के फसलों की कटाई और मड़ाई को लेकर किसान परेशानी झेल रहे हैं। अब देर में पक कर तैयार होने वाली धान की फसलें, नमी के चलते कंडवा रोग की चपेट में आ गई हैं। धान की फसलों में तेजी से फैल रहे कंडवा रोग को लेकर किसान चिंतित है।
किसान हनुमान पटेल ने बताया कि बीते माह बारिश और तेज हवा से धान की फसलों को काफी नुकसान हुआ।खेतों मे पानी भर जाने से पककर तैयार हुई धान की अगेती फसलों को सहेजने में किसानो के पसीने छूट रहे हैं। अब देर में पककर तैयार होने वाली धान की फसलों में कंडवा रोग का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। जिसे लेकर किसान चिंतित हैं। किसानों का कहना है कि कंडवा रोग से धान की पैदावार काफी घट जाएगी। उनका कहना है कि देर से पैदा होने वाली धान की फसलों में पैदावार अच्छी होती है लेकिन बीमारी की चपेट में आने से अब उम्मीदों पर पानी फिरता दिखाई दे रहा है। फसलों की पैदावार के सहारे परिवार की खुशहाली का सपना संजोए किसान काफी परेशान हैं। किसान दीपेंद्र पटेल,अ खंड प्रताप सिंह ने बताया कि कंडवा रोग से प्रभावित धान की पैदावार बेचने में भी बहुत नुकसान उठाना पड़ता है। उनका कहना है कि कंडवा रोग के चलते धान पीले पड़ जाते हैं। जिससे बाजार में उनकी अच्छी कीमत भी नहीं मिल पाती है।
क्यों लगता है धान में कंडवा रोग
हरिहरपुर। धान की फसल में लगने वाला कंडवा रोग फंफूद की वजह से होता है। धान की बालियॉ निकलते समय बारिश होने पर खेत में नमी ज्यादा हो जाती है।जिससे धान की बालियों में फंफूदी लगने की संभावना बढ़ जाती है। इस रोग से प्रभावित धान के फसलों की बालियों में लगे दाने पर काले रंग की गांठें बन जाती है जिन्हें फोड़ने पर पीले रंग जैसा पदार्थ निकलता है। बालियों पर लगने वाली यह बीमारी फसल के पैदावार को काफी प्रभावित करती है। यह पूर्वांचल क्षेत्र में धान की फसलों को प्रभावित करने वाली व्यापक बीमारी है।
कंडवा रोग से फसलों का करें बचाव
कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर एके सिंह ने बताया कि कंडवा रोग धान की बालियों को प्रभावित करता है। यह रोग खेत में ज्यादा नमी के कारण होता है। इस बीमारी के लिए फफूंद जिम्मेदार होते हैं। जो धान की बालियों पर लगते हैं। दानो पर काले और पीले रंग की गॉठें बन जाती है। इससे पैदावार काफी घट जाता है। बीमारी लगने की शुरुआत में यदि फफूंदनाशक और कीटनाशक का छिड़काव किया जाय तो इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है।लेकिन यदि बीमारी फैल गई है तो उसे नियंत्रित करना काफी मुश्किल है।