बेस लाइन डाटा के हिसाब से ओडीएम बन जाएगा जिला
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संतकबीरनगर। ओडीएफ अर्थात खुले में शौचमुक्त। स्वच्छ भारत की इस अवधारणा को साकार करने का दारोमदार जिन कंधों पर है, वे इसे केवल आंकड़ों की कलाबाजी समझ रहे हैं। अन्य योजनाओं की तरह यहां भी आंकड़ों की तस्वीर पेश कर गांवों को स्वच्छ मान लेने की पूरी कोशिश हो रही है। उम्मीद है कि संतकबीरनगर जनपद भी आंकड़ों की इस मजबूत जमीन पर इसी सप्ताह ओडीएफ घोषित हो जाएगा।
वर्ष-2012 के बेस लाइन सर्वे के हिसाब से जिले की 794 ग्राम पंचायतों में रहने वाले तीन लाख 33 हजार परिवारों में से उस वक्त करीब 99 हजार परिवार शौचालय का प्रयोग करते थे। शेष दो लाख 34 हजार परिवारों में शौचालय निर्माण का लक्ष्य था। दो अक्तूबर-2014 को केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत गांवों को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) बनाने का अभियान चलाया। बेस लाइन सर्वे के उन आंकड़ों के हिसाब से जिले में शौचालय निर्माण का कार्य पूर्ण हो गया है, लेकिन एमआईएस डॉटा को खुद विभाग का ही दूसरा आंकड़ा (जियो टैगिंग) गलत साबित कर रहा है। एमआईएस डॉटा में नवंबर के पहले सप्ताह में सभी दो लाख 34 हजार शौचालय बन गए थे, जबकि इनकी जियो टैगिंग (निर्मित शौचालय का फोटोग्राफ्स) 80 प्रतिशत से कम थी। 19 नवंबर को मंडलायुक्त बस्ती ने इसकी समीक्षा की तब एमआईएस डॉटा व जियो टैगिंग के अंतर ने अफसरों की खूब किरकिरी कराई। करीब 45 हजार फोटो ऐसे थे जो अन अप्रूव्ड श्रेणी में थे। मंडलायुक्त ने इस पर नाराजगी जताते हुए सभी गांवों का दो दिन में सत्यापन कराने के निर्देश दिए थे। सत्यापन के लिए 64 टीमों में 128 अफसर भी लगे, लेकिन यह कवायद कागजी ही अधिक रही। सीडीओ हाकिम सिंह ने मेंहदावल ब्लॉक के बौर ब्यास गांव में जांच की तो पता लगा कि तमाम लाभार्थियों को अभी निर्माण के लिए धन ही नहीं मिला है। डीपीआरओ की जांच में भी कई गांवों में शौचालय अपूर्ण पाए गए। डीपीआरओ आलोक कुमार प्रियदर्शी का कहना है कि वर्ष 2012 की बेस लाइन सर्वे के हिसाब से ही जिले को ओडीएफ घोषित करना है।