संतकबीरनगर/ हरिहरपुर। सावन के पहले दिन बृहस्पतिवार को श्रद्धालुओं ने शिव का जलाभिषेक किया। शिवभक्तों ने फूल, बेलपत्र, अच्छत और अन्य पूजा सामग्री के साथ मंदिरों में शिव की पूजा आराधना कर धूप दीप जलाए। इस दौरान शिव के जयकारे से शिवालय गूंजते रहे।
जिले के पौराणिक तामेश्वरनाथ धाम में बृहस्पतिवार की भोर से ही जलाभिषेक के लिए शिव मंदिर पर श्रद्धालु पहुंच गए। श्रद्धालुओं ने पोखरे और हैंडपंप से जल लेकर शिवलिंग का जलाभिषेक किया। फूल, चंदन, बेलपत्र सहित अन्य पूजा सामग्री को शिवलिंग पर अर्पित कर परिवार के खुशहाली की कामना की। शिव की पूजा आराधना के बाद महिला श्रद्धालुओं ने परिसर में स्थित दुकानों पर जरूरत के सामानों की खरीदारी भी की।
मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की दिक्कत न हो इसके लिए प्रशासन के जरिए मुकम्मल इंतजाम किए गए हैं। जलाभिषेक के दौरान मंदिर कमेटी के लोग व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन में प्रशासन के सहयोग में लगे रहे। गोस्वामी शशांक भारती ने बताया कि धाम में सावन महीने भर शिवभक्तों की भीड़ रहेगी। रुद्राभिषेक सहित अन्य अनुष्ठान अनवरत चलते रहेंग, लेकिन परिसर में सर्वाधिक शिवभक्तों की भीड़ हर सोमवार को होगी। क्षेत्र के स्थानीय शिव मंदिरों पर भी श्रद्धालुओं ने शिव का जलाभिषेक किया। नाथनगर क्षेत्र के निबिअहवा पोखरा, हरिहरपुर के सिद्धेश्वरनाथ और बेल्डुहा स्थित शिव मंदिर पर लोगों ने शिव का जलाभिषेक किया गया।
डीआईजी ने परखे सुरक्षा के इंतजाम ः हरिहरपुर। श्रावण मास में तामेश्वरनाथ मंदिर परिसर में होने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ के मद्देनजर डीआईजी संजीव त्यागी ने मंदिर परिसर में सुरक्षा के इंतजाम का निरीक्षण किया। उनके साथ एसपी संदीप कुमार मीना सहित अन्य पुलिस अफसरों ने मातहतों को परिसर की सुरक्षा के जरूरी निर्देश भी दिए। उन्होंने शिव मंदिर के सामने लगने वाली श्रद्धालुओं की लाइन की सुरक्षा के बारे में भी जानकारी ली। परिसर में स्थित पोखरे से लोगों की सुरक्षा के लिए भी इंतजाम करने का निर्देश दिया।
श्रावण मास में शिव के जलाभिषेक का है पौराणिक महत्व ःहरिहरपुर। पंडित ज्वाला प्रसाद त्रिपाठी ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार सावन के महीने में ही देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया था। समुद्र मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला जिससे पूरी सृष्टि के विनाश का संकट पैदा हो गया।
विष से संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उसे पीकर अपने कंठ में धारण कर लिया। विष की तीव्र गर्मी से महादेव का शरीर तपने लगा। उनकी इस तपन और जलन को शांत करने के लिए देवी-देवताओं ने मिलकर उन्हें शीतल जल अर्पित किया।
तभी से सावन में शिव जी को शीतलता प्रदान करने के लिए जलाभिषेक की यह परंपरा चली आ रही है। सावन के महीने में शिव के जलाभिषेक से मन वांछित फलों की प्राप्ति होती है।