जिले के धनघटा क्षेत्र में घाघरा के किनारे चपरा पूर्वी गांव के किसानों ने सुनहरे शकरकंद की खेती शुरू की है। इससे किसानों की आय तो बढ़ेगी ही साथ ही लोगों की सेहत भी सुधरेगी। मंगलवार को वैज्ञानिकों की एक टीम चपरा गांव पहुंची खेती के संबंध में जानकारी ली।
पंतनगर कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के राइस ब्रीडिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त और जिले के महुली क्षेत्र झिगुरापार गांव निवासी डॉक्टर रामचेत चौधरी ने बताया कि वे लीमा(पेरू) स्थित अंतर्राष्ट्रीय पोटैटो संस्थान गए थे। वहां उन्हें सुनहरी शकरकंद की खूबियों की जानकारी मिली। पूर्वांचल में सुनहरे शकरकंद की खेती को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने टाटा ट्रस्ट के सहयोग से पहल की है। पेरू से वह दो साल पहले सुनहरे शकरकंद का बीज लाए। इसके बाद संतकबीरनगर के चपरा पूर्वी, खैरगाड़, कटया और गोरखपुर जिले के रामनगर कडहजा गांव के करीब 300 किसानों को निशुल्क में बुआई के लिए बीज उपलब्ध कराया। सुनहरी शकरकंद की खासियत है कि इसमें विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
पूर्वांचल में खासकर बच्चों में विटामिन ए की कमी पाई जाती है। इसके सेवन से सेहत भी सुधरेगी।
चपरा पूर्वी गांव के करीब 50 किसानों ने इसकी खेती शुरू की है। किसान जून से नवंबर और फिर दिसंबर से अप्रैल तक वर्ष में दो बार इसकी खेती कर सकते हैं। मंगलवार को जिला कृषि अधिकारी शैलेंद्र वर्मा, टाटा ट्रस्ट के अभय गंभे व राकेश सिंह के साथ सुनहरे शकरकंद पर शोध कर रहीं अमेरिका की वैज्ञानिक डॉ. यानलो और जर्मनी डॉक्टर जोरगेन क्रोसेल चपरा पूर्वी गांव पहुंची। फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन की तरफ से यानलो को वर्ड फूड प्राइज के पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
इस दौरान टीम लोगों खेती के संबंध में किसानों से विविध जानकारियां लीं। इस दौरान किसानों ने पाले की समस्या का जिक्र भी किया। किसानों ने बताया कि प्रति एकड़ 90 से 100 क्विंटल उत्पादन हो रहा है और 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है। वैज्ञानिकों ने बताया कि सुनहरी शकरकंद की तीन प्रजातियां है,एसटी 14, वीए 45 और सीपी 440127 प्रजाति हैं।