सांथा में की गई केले की खेती। संवाद
सांथा। विकास खंड क्षेत्र में किसानों का रुझान केले की खेती की तरफ बढ़ रहा है। वैसे तो किसान तैयार फसल को बाजार के अभाव में बिचौलियों के हाथ बेचने को मजबूर हैं, फिर भी अन्य खेती पर खाद, बीज व सिंचाई की लागत की अपेक्षा केले की खेती पर कम लागत आ रही है। इससे किसानों की पसंद अब केले की खेती हो गई है।
सांथा विकास खंड के उत्तरी कछार क्षेत्र के टोटहा, हरैया, मुसहरा, सिंगहाभंडा समेत कई गांव के किसान परंपरागत खेती से हटकर केले की खेती की तरफ रुझान बढ़ा रहे हैं। केले की खेती से जुड़े किसान रुदल सहानी व नीलकमल का कहना है कि खाद, बीज व सिंचाई सहित अन्य समस्या से खेती करने पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है, जबकि केले की खेती एक बीघा में पंद्रह से बीस हजार रुपये की लागत आती है।
इसकी एवज में चालीस से पैंतालीस हजार का मुनाफा मिल जाता है। केले की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा दे रही है। बाजार के अभाव के बाद भी तैयार केले की फसल गोरखपुर, फरेंदा, फैजाबाद आदि के व्यापारी आकर खरीद ले रहे हैं। इससे किसानों को तत्काल नकद धनराशि मिल जा रही है।
टोटहा गांव के प्रगतिशील किसान बबलू मौर्या का कहना है कि केले की खेती के विकास व प्रोत्साहन के लिए सरकारी सुविधाएं नदारद है। किसान प्रदीप कुमार चौरसिया, सीताराम निषाद, सोमन मौर्य आदि का कहना कि समय पर न तो किसानों को आवश्यकता अनुसार पौधा उपलब्ध हो पाता है, और न ही अन्य कोई सुविधा मिल पा रही है। फिलहाल से सांथा क्षेत्र के किसानों में केले की खेती के प्रति रुझान बढ़ रहा है, और लोग अब इस खेती पर खुद को निर्भर कर रहे हैं।