संवाद न्यूज एजेंसी
संतकबीरनगर। जल संचयन एवं जल के समुचित उपयोग के लिए विभिन्न विभागों की तरफ से योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इस योजना के अंतर्गत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति के जरिये सिंचाई करने से पानी की बचत होती है और उत्पादन भी बढ़ता है।
जिला उद्यान अधिकारी समुद्रगुप्त मल्ल ने बताया कि इस पद्धति में कृषकों के जलस्रोत से ड्रिप की मुख्य लाइन को जोड़ दिया जाता है तथा मुख्य लाइन से पतली नलिकाएं हर पौधे तक पानी पहुंचाने का काम करती हैं।
ड्रिप सिंचाई पद्धति उन फसलों के लिए कारगर है जो एक निश्चित दूरी पर बोई जाएं, जिसमें केला, सब्जियां, गन्ना, बागवानी फसलें इत्यादि शामिल हैं। ड्रिप सिंचाई पद्धति के उपयोग से लगभग 40 प्रतिशत तक जल की बचत होती है तथा सिर्फ पौधों को जल मिलने के कारण खरपतवार तथा अवांछित पौधों में कमी आती है।
स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति में पौधों को फव्वारे से जल प्रदान किया जाए। स्प्रिंकलर पद्धति में उपयोग के अनुसार कई पद्धतियों का समावेश है, जिसमें पोर्टेबल स्प्रिंकलर, मिनी स्प्रिंकलर, माइक्रो स्प्रिंकलर तथा रेनगन शामिल हैं। इन पद्धतियों में फव्वारे से सिंचाई की जाती है। यह पद्धति उन सभी फसलों में लाभदायक है जो 1.5 मीटर से कम ऊंचाई की हो, जिसमें धान, गेहूं, सब्जियां, फूल इत्यादि शामिल हैं।
इस पद्धति के प्रयोग से लगभग 25 प्रतिशत तक जल उपयोग में कमी आती है। दोनों ही पद्धतियों के प्रयोग से उत्पादन में 20 से 25 प्रतिशत तक वृद्धि होती है। उद्यान विभाग के द्वारा इस योजना में ड्रिप एवं मिनी एवं माइक्रो स्प्रिंकलर की स्थापना पर 90 प्रतिशत जबकि रेनगन एवं पोर्टेबल स्प्रिंकलर की स्थापना पर 75 प्रतिशत का अनुदान देय है।