किसी के दूसरे के साथ उपकार करने का एहसास होना आदमी के मन में अहंकार भाव पैदा कर देता है। यह बातें शुक्रवार की देर सायं कुसौनांखुर्द में चल रहे पांच दिवसीय रामकथा में प्रवचन करते हुए अयोध्या के कथाव्यास रामसनेहीशरण ने कहीं।
उन्होंने कहा कि एक बड़े निस्पृह, सदाचारी एवं समाजसेवी संत थे जो कि जीवन भर निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई में ही लगे रहते थे। एक बार विचरण करते हुए देवताओं की टोली उनकी कुटिया के समीप से निकली। संत साधनारत थे। साधना से उठे तो देखा कि देवगण खड़े हैं। आदर सम्मान करने के बाद आसन दिया। देवतागण बोले- ‘आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई। आप जो चाहें वरदान मांग लें। इस पर संत ने कहा सब तो है मेरे पास। देवगणों ने एकस्वर में ने कहा कि आपको मांगना ही पड़ेगा अन्यथा हमारा बड़ा अपमान होगा। संत असमंजस में पड़े कि कोई तो इच्छा शेष नहीं है मांगे तो क्या मांगे। उन्होंने देवताओं से कहा आप सर्वज्ञ हैं व स्वयं समर्थ हैं। आप अपनी इच्छा से जो भी देंगे, मुझे वह स्वीकार होगा। देवता बोले- ‘तुम दूसरों का कल्याण करो!’ संत बोले- ‘क्षमा करें देव! यह दुष्कर कार्य मुझसे न बन पड़ेगा। देवता बोले- ‘इसमें दुष्कर क्या है?’ संत बोले- मैंने आजतक किसी को दूसरा समझा ही नहीं सभी मेरे अपने हैं। फिर दूसरों का कल्याण कैसे बन पड़ेगा। इस अवसर पर सरजूप्रसाद राय, रवीन्द्र राय, राघवेंद्र, देवेंद्रनाथ, गंगाराम, चंद्रशेखर राय, अरविंद राय, यशवंत, महेंद्र साहनी, शीला, संजय, रामवृक्ष, रमेशर आदि मौजूद रहें।