रोसया बाजार। शारदीय नवरात्र में ऐतिहासिक रामजानकी मार्ग पर स्थित बाबा कंकणेश्वर नाथ मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में सोमवार को कथा व्यास संत हरिदास पराशर ने गौकर्ण और धुंधकारी की कथा का रसपान कराया तो श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए।
कथावाचक ने कथा में बताया कि तुंगभद्रा नदी के तट पर आत्मदेव नामक एक व्यक्ति रहता था। उनकी पत्नी का नाम धुंधुली था। वह झगड़ालू किस्म की थी। संतान न होने से पति परेशान रहता था। आत्मदेव दुखी मन से आत्महत्या के लिए कुंए में कूदने वाले थे, तभी एक ऋषि ने बचा लिया। ऋषि से आत्मदेव ने कहा कि उनकी कोई संतान नहीं है। मैंने गाय पाल रखी है। गाय की भी संतान नहीं है। इस कारण आत्महत्या करने का कदम उठाया। यह सुनकर ऋषि ने अपने थैले से फल निकालकर कहा कि तुम यह फल अपनी पत्नी को खिला देना, इससे एक संतान की प्राप्ति होगी। घर जाकर आत्मदेव ने फल अपनी पत्नी को दिया, लेकिन पत्नी ने सोचा कि अगर गर्भवती वो गई तो नौ महीने तक कहीं आने-जाने का मौका नहीं मिलेगा। उसने फल नहीं खाया। एक दिन उसकी बहन घर आई। उसने उसे यह किस्सा सुनाया। बहन ने कहा मैं गर्भवती हूं। प्रसव होने पर बच्चा तुम्हें दे दूंगी। तुम यह फल गाय को खिला दो। आत्मदेव की पत्नी ने फल गाय को खिला दिया। कुछ दिन के बाद धुंधुली को उसकी बहन ने बच्चा दे दिया। संतान को देखकर आत्मदेव बड़ा खुश हुआ। बच्चे का नाम धुंधकारी रहा गया। इसके बाद गाय ने भी एक बच्चे को जन्म दिया जो मनुष्याकार था पर उसके कान गाय के समान थे। उसका नाम गोकर्ण रख दिया ।
कथा व्यास ने आगे बताया कि गोकर्ण और धुंधकारी दोनों गुरुकुल गए। गुरुकुल में अपना कार्य खुद करना पड़ता है। इस बीच धुंधकारी नशेड़ी, चोर निकल गया। एक दिन उसने अपनी माता को मार डाला। पिता व्यथित होकर वन चले गए। धुंधकारी वेश्याओं के साथ रहने लगा। वेश्याओं ने एक दिन धुंधकारी को मार डाला। मरने के बाद धुंधकारी भूत-प्रेत बन गया। गौकर्ण त्रिकाल संध्या पूजा करते थे। सूर्यनारायण भगवान से पूछते हैं कि इसके लिए क्या उपाय करना पड़ेगा। सूर्यनारायण ने कहा कि तुम सात गांठ बांस मंगाओ और भागवत का आयोजन करो। हर दिन बांस की गांठ धीरे-धीरे फट जाती है, जो सात दिन फटती है। तब पवित्र होकर धुंधकारी एक दिव्य रूप धारण करके सामने खड़ा हो जाता है। इस दौरान उमेश सिंह, सुमन्तराव, कृष्णचंद्र माॅझी, बैजनाथ, गीता देवी आदि मौजूद रहे।