जिले में प्रदूषण मापने का नहीं है कोई इंतजाम, जिला अस्पताल में सांस के रोज आ रहे 100 से 150 मरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
संतकबीरनगर। हवा में दिन-प्रतिदिन प्रदूषण घुलता जा रहा है। रोज बढ़ रही वाहनों की संख्या, सड़कों की खराब स्थिति, फैक्ट्री और कारखानों से निकलने वाले धुंए से प्रदूषण का खतरा बढ़ रहा है। जिला अस्पताल में प्रतिदिन 100 से 150 मरीज सांस से संबंधित पहुंच रहे हैं। इसमें से करीब 70 से 75 मरीज प्रदूषण से बीमार हो रहे हैं।
संतकबीरनगर का एक्यूआई लेवल 147 है, जो मानक से अधिक है। ऐसे में यहां रह रहे लोगों की सेहत बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है। सांस संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। जिले में प्रदूषण मानक यंत्र नहीं है। जिला अस्पताल में भी इससे संबंधित बीमारियों की जांच के लिए सुविधा उपलब्ध नहीं है।
वरिष्ठ परामर्शदाता डॉक्टर सिद्धार्थ कुमार ने बताया कि वायु में मिलने वाले धूल के कणों, धुंए आदि प्रदूषणों के कारकों से लोग बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि यदि समय रहते लोग सचेत नहीं हुए तो गंभीर बीमारियों जैसे सोचने, समझने की शक्ति का कम पड़ जाना, मस्तिष्क में क्लाटिंग होना, नवजात बच्चों का अस्थमा का शिकार हो जाना आदि के मामले बढ़ सकते हैं।
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सांस संबंधी बीमारियों के लक्षण
प्रदूषण से होने वाली सांस संबंधी बीमारियों में सर्दी, जुखाम, गले में खराब होना, सांस फूलने के अलावा आंखों का लाल होना, आंखों से पानी आना, अस्थमा का अटैक आदि प्रमुख लक्षण है। इसका सबसे अधिक प्रभाव बुजुर्गों, बच्चों के साथ गर्भवतियों पर पड़ता है। प्रदूषण से सब्जी और फलों की ऊपरी सतह खराब हो जाती है।
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बिना जरूरत के घर से न निकले।
भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें।
- फल-सब्जी को गर्म पानी से धोकर इस्तेमाल करें।
- परेशानी होने पर डॉक्टर से परामर्श लें।
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15 साल से पुराने 21,361 वाहन दौड़ रहे
एआरटीओ कार्यालय के मुताबिक जिले में कुल 1,81,373 वाहन पंजीकृत हैं। इसमें से 15 साल से पुराने वाहनों की कुल संख्या 21,361 है। व्यावसायिक वाहनों की संख्या 7218 है। प्राइवेट वाहनों की संख्या 14,143 है। एआरटीओ कार्यालय ने प्रदूषण का मानक पूरा न करने वाले 290 वाहनों का पंजीकरण रद्द कर दिया है। इसमें 250 व्यावसायिक वाहन और 40 प्राइवेट वाहन शामिल हैं। मानक को पूरा नहीं करने वाले वाहनों की जांच किए जाने की बात बताई है। ऐसे वाहनों के पकड़े जाने पर जब्त की कार्रवाई की जाती है।
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औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण बोर्ड से एनओसी लेकर ही फैक्ट्री संचालित होती है। फैक्ट्री में चिमनी नहीं है और न ही पानी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में प्रदूषण का कोई खतरा नहीं है।
- निनित जालान, धागा फैक्ट्री मालिक
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जैव चिकित्सा अपशिष्ट की दो फैक्ट्री संचालित होती है। एक फैक्ट्री संतकबीरनगर में और दूसरी गोरखपुर में संचालित हो रही है। फैक्ट्री में मेडिकल के अवशिष्ट कचरे का निस्तारण होता है। अभी काफी संख्या में ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे है,जो प्रदूषण से बचाव का इंतजाम नहीं किए है। इसमें क्लीनिक, पशुओं के अस्पताल आदि भी शामिल है। प्रदूषण दो तरह का होता है। वह मेडिकल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के सचिव भी हैं।
- विनय वर्मा, फैक्ट्री मालिक
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औद्योगिक क्षेत्र का मानक अलग होता है। समय-समय पर प्रदूषण की जांच की जाती है। वैसे बस्ती में ही लैब नहीं है। जिसकी वजह से प्रदूषण मापने में दिक्कत है। क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी का पद रिक्त है। कार्यालय में स्वीकृत पद के सापेक्ष कम संख्या में कर्मियों की तैनाती है।
- अरुण श्रीवास्तव, वैज्ञानिक सहायक, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कार्यालय बस्ती