हैंसर/ मेंहदावल (संतकबीरनगर)। घाघरा और राप्ती की तबाही से बेघर हुए लोग बांध पर शरण लेने को लाचार हो गए है। शुक्रवार की सुबह से घर छोड़ कर खाली हाथ बांध पर पहुंचने वाले लोगों की रात दर्द भरी गुजरी। शनिवार को भी दिन भर भोजन नहीं मिलने से छोटे- छोटे बच्चों की भूख मिटाने की बेबसी पीड़ितों की जुबान से छलक गई।
घाघरा ने 22 गांवों को मैरुंड कर दिया है। इन गांवों के करीब 1000 परिवार एमबीडी बांध पर दौलतपुर, जगदीशपुर, तिघरा, ढोलबजा, कम्हरिया बाग में पहुंच कर शरण लिए हुए है। बाढ़ पीड़ित गंगादीन ,अमरजीत, ओंकार, सीताराम, प्रभावती, सुमित्रा ,नंदलाल ने बताया कि पूरा दिन भोजन न मिलने से बडे तो किसी तरह बर्दाश्त किए,लेकिन छोटे बच्चे भूख से बिलबिल उठे। बच्चों की भूख नहीं मिटा पाने का दर्द किसे सुनाए,कोई सुनने वाला नहीं है। बाढ का कहर घर पर आफत बन कर टूट पड़ा और सभी उपयोगी घरेलू सामान नष्ट हो गए। अभी तक प्रशासन ने खाने- पीने का कोई इंतजाम नहीं किया। यहां तक कि मोमबत्ती और माचिस तक नहीं दिया। अंधेरे में पानी में निकलने वाले जहरीले कीडे मकोडे का भी खतरा बना हुआ है। तमाम परिवार तो नारे रिश्तेदारों के वहां शरण लेने पहुंचने लगे है। दुल्हन और बेटियों को सुरक्षित रिश्तेदारों के वहां लोग पहुंचा रहे है। जनप्रतिनिधि भी बाढ़ पीड़ितों की सुधि नही ले रहे है।
करमैनी-बेलौली तटबंध पर ज्यो-ज्यों राप्ती के जलस्तर का दवाव व बंधे में रिसाव का मामला सामने आता गया त्यों-त्यों तटबंध से सटे गांवों मे दहशत व डर का माहौल पनपना शुरु हो गया। घरों से खाने-पीने के सामान के साथ ही मंहगें व जरुरी सामान सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाने की होड मच गई। कुछ परिवारों ने तटबंध पर अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया। विशुनपुर गांव के विनोद व त्रिलोकी अपने भेडों के साथ बानडूमर गांव के पास तटबंध पर सुरक्षित जगह देख कर खुलें आसमान के नीचें अपना बसेरा बना लिए हैं। इन्ही के साथ इनके जानवर भी रह रहे हैं। इनलोगो ने बताया कि गांव में रहने पर लगातार यह डर सता रहा था कि पता नही कब पानी के दवाव में तटबंध टूट जाय औंर धनजन की हानि के साथ ही बेजुबान जानवरों को बाढ की भेंट चढनी पडें। इसलिए खुले आसमान के नीचे आकर सुरक्षित महसूस तो कर रहें हैं पर रात भर नींद नही आ रही हैं। खाने की जगह बाढ की आशंका परेशान कर रही हैं। तिवारीपुर गांव की चन्द्रावती,विन्दु,सुमेर,राजेन्द्र का दर्द यह हैं कि घरों की जगह सुरक्षित ठिकाने के लिए तटबंध का सहारा जरुर ले लिया गया पर दर्द कम नही हुआ खुले आसमान मे सडक को ही विस्तर बना लिया गया हैं पानी भी जो मिल रहा हैं वह पीने योग्य नही हैं गनीमत यही हैं कि बरसात नही हो रहा बर्ना परेशानी औंर बढ जाती,नदी का बढ़ता जलस्तर दिलों की धड़कन बढ़ा दिया है। एक तरफ गाढ़ी पूंजी लगाकर खेती की दूसरी तरफ इस बार नदी तांडव मचाने के लिए करवल कर रही हैं अब तो खेती की जगह जान बचाने के लाले पडे़ हैं। एडीएम सत्येंद्र नाथ शुक्ल ने बताया कि घाघरा के बाढ़ से प्रभावित लोगों में पॉलीथीन का वितरण करा दिया गया है। भोजन आदि की व्यवस्था कराए जाने का निर्देश एसडीएम को दिया गया है।