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पक्षी विहार घोषित होने के 28 वर्ष बाद भी नहीं बदली तस्वीर

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बखिरा (संतकबीरनगर)। ठंड के चार महीने तक साइबेरिन पक्षियों की पसंदीदा बखिरा की मोती झील का 28 वर्ष बाद भी कायाकल्प नहीं हो पाया। वर्ष 1990 में इस झील को राष्ट्रीय पक्षी विहार तो घोषित कर दिया गया लेकिन व्यवस्था में बदलाव के लिए कोई खास प्रयास नहीं हुआ। विकास के नाम पर महज कुछ एक कमरे बना दिये गए हैं। कर्मचारियों की कमी के चलते झील में आने वाले विदेशी पक्षियों का शिकार रुक नहीं पा रहा है। अब तो मानदेय नहीं मिलने से नाराज नाविक भी पर्यटकों को झील में घूमाने नहीं ले जा रहे।
29 वर्ग किमी में विस्तारित बखिरा का मोती झील सरकारी अभिलेख में 28 वर्ष पूर्व राष्ट्रीय पक्षी विहार बना दिया गया। वजह यह कि इस झील में हर वर्ष नवम्बर से लेकर फरवरी महीने तक साइबेरियन पक्षियों समेत ठंड वाले क्षेत्रों में पाई जाने वाली कई प्रजातियों की पक्षियां प्रवास पर आती हैं। अनुकूल मौसम व विशाल मोती झील के पानी में रंग बिरंगी पक्षियों की अठखेलियां बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करती हैं।
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राष्ट्रीय पक्षी विहार बनने के बाद इसे बड़े पर्यटन स्थल के रूप में पहचान मिलने की संभावना थी लेकिन महज नाम ही बदला, अब तक स्वरूप में तनिक भी अंतर नहीं आया। पक्षियों को संरक्षण देने का ठोस उपाय करना तो दूर कर्मचारियों की कमी से हालात और खराब हो गए। पक्षी विहार कार्यालय में तैनात स्टाफ में से कुछ रिटायर हो गए तो कुछ कर्मी स्थानांतरित होकर चले गए। इन दिनों इस झील की सुरक्षा मात्र एक वन रक्षक व व एक रेंजर के हवाले है। रेंजर भी दिसम्बर महीने में ही सेवानिवृत्त हो जाएंगे। एक वर्ष से अधिक समय से मानदेय नहीं मिलने से नाराज नाविक भी पर्यटकों को झील की सैर कराने से मना कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस झील का प्रशासनिक नियंत्रण महराजगंज जिले के सोहगी वरवा वन्य जीव प्रभाग के डीएफओ के पास है।
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एनजीटी में चल रहा है मामला : डीएफओ
संतकबीरनगर के डीएफओ टी रंगाराजू का कहना है कि बखिरा पक्षी विहार का मामला एनजीटी की पिछली बैठक में भी उठा था। इस पक्षी विहार की देखरेख का जिम्मा महराजगंज जिले के वन विभाग के अधीन है। सुंदरीकरण समेत अन्य कार्यों पर भी एनजीटी की बैठक में चर्चा हुई थी। अब एनजीटी के निर्देशानुसार ही इसमें कार्रवाई होनी है।
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