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सामूहिक विवाह योजना

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अनुदान राशि बढ़ाने पर भी नहीं मिले रहे आवेदक
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पिछले वर्ष 101 और इस वर्ष अब तक 396 जोड़ों का हुआ है विवाह
इस वर्ष तीन बार आयोजित हो चुका है कार्यक्रम, 1500 जोड़ों के विवाह का है लक्ष्य
सरकार ने अनुदान राशि 35 से बढ़ाकर 51 हजार रुपये कर दी है
(सामूहिक विवाह की फाइल फोटो)
उदयभान त्रिपाठी
संतकबीरनगर। शादियां दो व्यक्तियों और दो परिवारों के मिलन से ज्यादा अब स्टेटस सिंबल बन चुकी हैं। लोग बेटे-बेटियों की शादी में खर्च के लिए कर्ज लेने से लेकर जमीन, मकान तक गिरवी रख देते हैं, जबकि सरकार की सामूहिक विवाह समारोह के लिए वर-वधु नहीं मिल रहे हैं। यह हालत तब है जब शादी अनुदान की धनराशि 35 से बढ़ाकर 51 हजार रुपये कर दी गई है। नवदंपती को आशीर्वाद देने के लिए अफसर और सांसद, विधायक तक शामिल हो रहे हैं।
समाज कल्याण विभाग की तरफ से शादी अनुदान की योजना पुरानी है, लेकिन प्रदेश की योगी सरकार ने इसे सामाजिक बदलाव का जरिया बनाने के लिए नई पहल करते हुए इसके लिए कार्यक्रम आयोजित कराना शुरू कर दिया। पहले शादी करने वाले जोड़ों को 90 दिन के भीतर विभाग में आवेदन करना होता था जिस पर उन्हें अनुदान राशि दी जाती थी। अब सामूहिक कार्यक्रम आयोजित कर वधू को धनराशि के साथ-साथ उपहार दिया जा रहा है। लोग इन कार्यक्रमों में बेटे-बेटियों की शादी नहीं कराना चाहते। जिले को इस वर्ष 1500 जोड़ों का सामूहिक विवाह कराने का लक्ष्य मिला। पहला कार्यक्रम नवंबर में मेंहदावल में आयोजित हुआ। तमाम प्रयास के बावजूद 48 जोड़ों का ही विवाह हो पाया। दिसंबर में खलीलाबाद में आयोजित कार्यक्रम में 127 जोड़ों का विवाह कराया गया। जनवरी में सरकार ने अनुदान की राशि बढ़ाकर 51 हजार रुपये कर दी। नौ फरवरी को खलीलाबाद में आयोजित कार्यक्रम में बहुत प्रयास के बाद 221 जोड़ों का विवाह संपन्न हो पाया। कुल मिलाकर 396 जोड़ों का ही विवाह हो पाया। लक्ष्य पूरा करने के लिए अब भी 1104 जोड़ों का विवाह 31 मार्च कतक कराया जाना है। पिछले वर्ष भी इस योजना के तहत मात्र 101 शादियां हो पाई थीं।
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45 हजार तो दुल्हन को ही मिलना है
शादी अनुदान के लिए 51 हजार रुपये की जो धनराशि प्रत्येक जोड़े पर आवंटित की गई है, उसमें से 35 हजार रुपये दुल्हन के बैंक खाते में जमा होना है। 10 हजार रुपये दुल्हन के कपड़े और गहने पर खर्च होना है। शेष छह हजार रुपये बारातियों के स्वागत पर खर्च होना है।

परम्पराएं बनती हैं बाधक : डॉ. विजय
(फोटो)
एचआरपीजी कॉलेज के समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विजय मिश्र का कहना है कि भारत में शादियों की एक सामाजिक परंपरा है, जिसका निर्वहन अलग-अलग रूपों में सभी धर्मों में होता है। सरकार के आयोजन में सामाजिक परंपराओं और लोकाचारों का निर्वहन नहीं हो पाता। लोग इस आयोजन से इसलिए भी दूर भाग रहे हैं कि इसे गरीबों की शादी के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। इसमें शादी करके वे सामाजिक रूप से तौहीन नहीं कराना चाहते।
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बजनजागरूकता से आएगा बदलाव
(फोटो)
जिला समाज कल्याण अधिकारी विजय लक्ष्मी का कहना है कि इस तरह के आयोजन में लोग अभी अपने बेटे-बेटियों की शादी नहीं करना चाहते। हालांकि बिना इसमें शामिल हुए अनुदान चाहने वालों की संख्या अधिक है। इसे सामाजिक बदलाव का संवाहक बनाने के लिए जनजागरूकता जरूरी है। इसलिए जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को समझाया जा रहा है। जनवरी में तीनों तहसील क्षेत्रों में एक-एक शिविर आयोजित किए गए थे, जिसके बाद संख्या बढ़ी है।
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