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सोमवार की देर शाम पुलिस चौकी पहुंची बच्ची

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फोटो---
पुलिस अंकल! मम्मी को जेल भेज दो, वह मुझे पुआल पर सुलाती है
- तीन साल की बच्ची के मुंह से ये बातें सुन हतप्रभ रह गए चौकी इंचार्ज
- मासूम बोली, मां बाबू को मोजे पहनाती है, प्यार करती है और मुझे पूछती भी नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
संतकबीरनगर। पुलिस अंकल! मेरी मम्मी को जेल भेज दो। वह रात में मुझे पुआल पर सुलाती है और खुद बाबू (एक साल के छोटे भाई) के साथ सोती है। बाबू को मोजे भी पहनाती है। उसे गोद में लेती है, दुलार करती है, अच्छे-अच्छे कपड़े पहनाती है। मुझे तो वह पूछती भी नहीं। स्कूल भी नहीं भेजती। सोमवार को तीन साल की बच्ची के मुंह से ये बातें सुन पंचपोखरी चौकी इंचार्ज हतप्रभ रह गए।
वाकया सोमवार शाम छह बजे का है। चौकी इंचार्ज जितेंद्र यादव पुलिस चौकी में गांव के लोगों से बातचीत कर रहे थे। तभी पलक नाम की तीन साल की बच्ची वहां पहुंची और अपनी मम्मी की शिकायत करने लगी। कहा, उसकी मां उसके छोटे भाई को ज्यादा प्यार करती है और उसे अपने पास सोने भी नहीं देती। पुआल पर सुलाती है। बच्ची की बातें सुन चौकी इंचार्ज ने उसे प्यार से अपने पास बैठाया। बातों-बातों में उन्होंने बच्ची के घर और पिता के बारे में पूछा। वहां बैठे कुछ लोग बच्ची को पहचानते थे। उन्होंने बताया कि बच्ची का घर चौकी के पास ही है। चौकी इंचार्ज बच्ची को लेकर उसके घर पहुंचे और परिजनों को सारी बातें बताईं। बच्ची की मां और दादी ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई बात नहीं। उसे पूरा प्यार दिया जाता है। दादी ने कहा कि उनकी बहू छोटे बच्चे के साथ बिस्तर पर सोती है। रात को सोते समय छोटे बच्चे पर पलक के हाथ-पैर न पड़ जाएं इस भय से उसे अलग सुलाया जाता है। ठंड का मौसम होने की वजह से घर में नीचे पुआल डाला जाता है और उसके ऊपर चादर-कथरी डालकर वह खुद पलक के साथ सोती हैं। इस पर चौकी इंचार्ज ने उन्हें बच्ची का पूरा ख्याल रखने और बेटे-बेटी में फर्क न करने की सलाह दी।
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‘यह सहोदर ईष्या है’
- एचआरपीजी कॉलेज, खलीलाबाद की मनोविज्ञान की प्रोफेसर डॉ. मंजू मिश्रा ने कहा कि पलक ने जो कुछ भी कहा वह असामान्य नहीं है। यह सहोदर ईष्या है। घर में छोटे भाई या बहन को अधिक प्यार मिलता देख बच्चों में ऐसी भावना आ जाती है। उन्हें लगता है कि माता-पिता उसके हिस्से का प्यार छोटे को दे रहे हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे बड़े बच्चे को प्यार से समझाएं कि वे उसे भी उतना ही प्यार करते हैं। ऐसा नहीं करने पर कई बार बच्चे हीनभावना के शिकार हो जाते हैं।
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