चंदौसी(संभल)। नगर से 13 किलोमीटर दूर चंदौसी-संभल मार्ग पर थाना बनियाठेर से सटे बिलारी क्षेत्र की ग्राम पंचायत सरथल के टीलों में पांचवीं सदी के महाभारत काल के राज दबे हैं। गांव सरथल का संभल के तीर्थों से पुराना नाता है। बताया जाता है कि ये नगरी महाभारत काल के राजा सुरथ की नगरी थी। जिससे यहां के टीलों की खोदाई में आज भी पांचवीं सदी की मूर्तियां और सिक्के निकलते हैं।
हालांकि वर्ष 2010 से पुरातत्व विभाग मेरठ द्वारा टीलों की खोदाई पर रोक लगा दी गई है। ग्रामीण इसे पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग कर रहे हैं। ग्राम पंचायत सरथल की आबादी 10 हजार की है। पूरा गांव टीलों पर बसा है। क्योंकि गांव में सभी सड़कें ऊंची-नीची हैं। गांव में खड़ंजे ही पड़े हैं। गांव में स्थित प्राचीन शिव शक्ति धाम मंदिर की मान्यता दूर-दूर तक है। यहां मंदिर में स्थापित माता की पिंडी है। गांव के बुजुर्ग भी बताते हैं कि ये मंदिर सदियों पुराना है। मंदिर के नाम 40 बीघा भूमि है। जिस पर खेती होती है। जिसकी आमदनी मंदिर के जीर्णोद्धार पर खर्च की जाती है।
बताया जाता है कि मंदिर पर जिस स्थान पर माता पिंडी के रूप में विराजमान हैं। उसके पास ही एक गुफा है। जो संभल होते हुए दिल्ली तक जाती है। फिलहाल गुफा बंद है। मंदिर के पास ही बीघों में तालाब बना है। खास बात ये है कि गांव के टीलों की खोदाई में आए दिन पांचवीं सदी की देव मूर्तियां निकलती हैं। इन मूर्तियों को गांव के चामुंडा मंदिर और उद्यान विभाग की नर्सरी में रखवा दिया गया है। पिछले वर्षों में खोदाई में निकली करीब एक फीट की विष्णु जी की मूर्ति मंदिर में स्थापित कर दी गई है। साथ ही यहां टीलों की खोदाई में सोने के सिक्के आदि भी निकल चुके हैं। जिससे वर्ष 2010 में पुरातत्व विभाग मेरठ ने टीलों की खोदाई पर रोक लगा दी है। साथ ही वहां उद्यान विभाग की नर्सरी बना दी गई है।
पूजा करने आती थीं पृथ्वीराज चौहान की बहन
सरथल के देवी मंदिर के पास एक गुफा भी बताई जाती है। जो अब बंद है। बताया जाता है कि ये गुफा संभल होते हुए दिल्ली तक जाती है। पृथ्वीराज चौहान की बहन वेला देवी गुफा के रास्ते यहां देवी मंदिर में पूजा करने आती थीं।
विशाल तालाब में स्नान करने से होते चर्म रोग दूर
सरथल के शिव शक्ति धाम मंदिर के पीछे विशाल तालाब है। गांव के रविंद्र सिंह ने बताया कि चैत्र नवरात्र में यहां विशाल मेला लगता है। मेले में उत्तर प्रदेश ही नहीं अन्य राज्यों से श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है कि तालाब में स्नान करने से चर्म रोग दूर होते हैं। साथ ही मनोकामना पूरी होने पर लोग पीले वस्त्र पहन कर माता के दर्शन को आते हैं। मेले के दौरान बैलों की दौड़ भी होती है। ये तालाब सैकड़ों बीघा में फैला हुआ था। अधिकांश भूमि पर कब्जे कर लिए गए। अब तालाब करीब सौ बीघा में सिमट कर रह गया है।
दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में दर्ज है राजा सुरथ की कहानी
पांचवीं सदी महाभारत काल के राजा सुरथ की कहानी दुर्गा सप्तशती में दर्ज है। रविंद्र सिंह ने बताया कि पूर्वजों के बताए अनुसार सरथल राजा सुरथ की नगरी कहलाई जाती थी। राजा सुरथ व सुधनवा दो भाई थे। महाभारत युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेघ यज्ञ किया था। अश्व को राजा सुरथ ने पकड़ लिया। राजा सुरथ भी कृष्ण के भक्त थे। तब अर्जुन ने तीन बाणों से राजा सुरथ का वध करने की प्रतिज्ञा ली थी। राजा सुरथ ने अर्जुन के छोड़े गए दो बाण काट दिए। तीसरे बाण पर श्रीकृष्ण स्वयं बैठ कर आ गए। राजा सुरथ ने वह बाण भी काट दिया। कटा हुआ हिस्सा आगे चला गया। दोनों भक्त का मान रखा गया।
एक किवदंती ये भी
राजा सुरथ काफी न्याय वाले थे। अश्व पकड़े जाने पर जब युधिष्ठिर से युत्र की तैयारी चल रही थी तो राजा सुरथ के भाई सुधनवा देरी से तैयार हो सके। तब वचन अनुसार उन्होंने राजा सुरथ को खौलते तेल में डलवा दिया। लेकिन तेल ठंडा हो गया। इसके बाद एक ब्राह्मण ने तेल में नारियल फेंक दिया। जो फट गया। जिससे ब्राह्मण की एक आंख खराब हो गई। बताया जाता है कि उस परिवार में बच्चे अपंग पैदा होते हैं। साथ ही टीलों की खोदाई में निकले सिक्के व आभूषण भी कोई नहीं लेता। कहा जाता है कि आभूषण और सिक्के फलीभूत नहीं होते।
1145 संवत में बसा था गांव सरथल
गांव सरथल के रविंद्र सिंह ने बताया कि ये गांव उनके पूर्वजों ने 1145 संवत में वैशाखी सुधी की पंचमी को बसाया था। उनके पूर्वज सूरत भान सिंह ने ये गांव बसाया था। सूरत भान सिंह के पुत्र दान सहाय, दान सहाय के पुत्र रघुनाथ, रघुनाथ के पुत्र हरपाल, हरपाल के पुत्र गौतम सैन, गौतम सैन के पुत्र बल्लेराम, बल्लेराम के पुत्र पीतम भवानी, पीतम भवानी के पुत्र दुर्गा सिंह, दुर्गा सिंह के पुत्र लक्ष्मण सिंह, लक्ष्मण सिंह के पुत्र मोहकम सिंह, मोहकम सिंह के पुत्र बड़ी सिंह, बड़ी सिंह के पुत्र ज्ञान सिंह, ज्ञान सिंह के पुत्र खैराती सिंह, खैराती के पुत्र रेवती, देवी सिंह, पहलवान सिंह, झंडू सिंह, झंडू सिंह के पुत्र उदय भान सिंह, सूरजभान सिंह, उदय भान के पुत्र यादवेंद्र सिंह गांव में पीढ़ी दर पीढ़ी रहे। जबकि यादवेंद्र सिंह के पुत्र रविंद्र सिंह, सुधीर कुमार, अमित कुमार व आलोक कुमार है। रविंद्र सिंह परिवार के साथ गांव में रहते हैं और मंदिर की देखभाल करते हैं।