संभल। त्योहारों की परंपरा हमारे देश में सबसे अलग है। देश में होने वाले सभी पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं। रक्षाबंधन भाई और बहन के प्रेम का अटूट बंधन वाला त्योहार है। इसको पूरा देश मनाता है। तमाम सौहार्द की मिसालें सामने आती हैं। कहीं हिंदू बहन अपने मुस्लिम भाई को राखी बांधती है तो कहीं मुस्लिम बहन द्वारा अपने हिंदू भाई को राखी बांधी जाती है। इन रिश्तों की मजबूती से ही हमारे त्योहार दुनिया में सबसे अलग हो जाते हैं, लेकिन संभल जिले में बेनीपुर चक ऐसा गांव हैं जहां रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया जाता।
किसी अनजाने डर की परंपरा को सादियों से निभाया जा रहा है। संभल से करीब पांच किलोमीटर दूर इस गांव में सदियों से रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया जाता। वजह यह है कि कहीं बहन उपहार में जमींदारी न मांग ले जिससे उन्हें फिर अपना गांव छोड़ना न पड़े। इसके पीछे एक सदियों को पुरानी कहानी है जिसको आधुनिक युग की पीढ़ी भी मान रही है।
गांव के बुजुर्गों की मानें तो वे पहले अलीगढ़ की अतरौली तहसील के गांव सेमराई में रहते थे। जबकि ये गांव ठाकुरों का था। बावजूद इसके यादव और ठाकुरों में कभी कोई टकराव की स्थिति नहीं आई और दोनों ही जाति के लोग खुशी से रहते थे। कई पीढ़ियों तक ठाकुर परिवार में कोई बेटा नहीं जन्मा, इसलिए इस परिवार की एक बेटी ने यादव जाति के युवक को राखी बांधना शुरू कर दिया था, लेकिन एक बार ठाकुर की बेटी ने यादव भाई से उसकी जमींदारी उपहार में मांग ली। इस पर उन्होंने गांव छोड़ने का फैसला लिया और बाद में सभी यादव जाति के लोग बेनीपुर चक में आकर बस गए थे। तब से यादव परिवारों ने फैसला लिया था कि अब राखी नहीं बंधवाएंगे। इस कहानी जैसी परंपरा को अभी की पीढ़ी भी निभा रही है।