कुदरत के कहर से किसान ही बेजार नहीं हैं, कारोबारी भी परेशान हैं। पिछले तीन सालों से उत्पादन प्रभावित होने से दाल इंडस्ट्री पर भी संकट के बादल छा गए हैं।
इससे दाल का कारोबार घटते-घटते दो से ढाई करोड़ रुपये प्रति माह तक पहुंच गया है और तमाम मिलर्स अपनी मिलें बंद रहे हैं।
हाल यह है कि, शहर में फिलहाल पांच मिलर्स और करीब 10 थोक विक्रेता ही बचे हैं। चंदौसी की मंडी में अब सीजन में प्रति माह करीब चार हजार क्विंटल और ऑफ सीजन में सिर्फ दो हजार क्विंटल का ही कारोबार हो पा रहा है।
अरहर, मूंग, मसूर, उड़द आदि की दालों के लिए मशहूर चंदौसी की मंडी अपना वजूद खोती जा रही है। पहले यहां से दूर-दराज के जिलों तक हजारों क्विंटल दाल भेजी जाती थी। यहां हर माह करीब दस से पंद्रह हजार क्विंटल दाल की खरीद-फरोख्त होती थी।
धीरे-धीरे किसानों का उत्पादन घटा तो मिलर्स पर भी बुरा प्रभाव पड़ा। पर्याप्त आपूर्ति नहीं मिलने से दाल मिलों को दूसरे प्रदेशों से कच्चे माल को मंगाना पड़ा। बाहर से लाए कच्चे माल की वजह से लागत बढ़ने से धीरे-धीरे व्यापार प्रभावित होने लगा। यहां की दालें महंगी हुईं, नतीजतन मांग में गिरावट शुरू हो गई। पिछले तीन सालों में दाल इंडस्ट्री अर्श से फर्श पर आ गई।
नीलगाय के डर से अरहर की खेती हुई बंद
चंदौसी। एक जमाना था जब क्षेत्र में खेत में अरहर लहलहाती थी। बंपर पैदावार के बाद मंडी में सोने के दाने की तरह चमचमाती अरहर रौनक बढ़ाती थी। क्षेत्र से दाल मिलर्स अरहर को खरीद कर दाल का उत्पादन करते थे। स्थानीय स्तर पर खरीद और बंपर आवक से मिलर्स की लागत कम आती थी, जिससे देश की दूसरी बड़ी मंडियों से स्पर्धा में चंदौसी की मंडी बाजी मार जाती थी। अब लागत अधिक आने से तैयार माल की कीमत बढ़ गईं। आवक नहीं होने से उत्पादन घट गया। कारोबारी परेशान हैं।
दूर दराज से हो रही उड़द की आपूर्ति
चंदौसी। कारोबार बचाने के जद्दोजहद में दूर दराज से उड़द मंगाया जा रहा है। दिल्ली, महाराष्ट्र, वर्मा, मध्यप्रदेश, रंगून आदि स्थानों से उड़द आयात किया जा रहा है। दाल मिलर्स उड़द खरीद कर अपने कारोबार को कर रहे हैं। उत्पादन में लागत बढ़ने से थोक विक्रेता और रिटेलर भी परेशान हैं।
पहले फसल की कीमत कम थी। आवक पर्याप्त थी। अब बिल्कुल उलटा हो रहा है। अरहर की फसल पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। उड़द की फसल नाममात्र को बची है। कीमतों में बेतहाशा इजाफा हुआ है। करोबार में लागत निकालने की चुनौती बनी हुई है। -आमोद वार्ष्णेय, दाल मिलर्स।
दाल कारोबार पर कुदरत का कहर है। किसान की फसल पर मौसम की मार से उत्पादन तेजी से घटा है। फसल की आवक न के बराबर रह गई है। दूसरे राज्यों से अनाज मंगाकर करोबार कर रहे हैं। उत्पादन में लागत बढ़ी है।-प्यारेलाल, दाल मिलर्स।
दाल की मंडी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पहले अरहर और उड़द की बंपर पैदावार होती थी। आवक भी बंपर थी। किसान को फसल में लगातार हो रहे नुकसान से आवक न के बराबर रह गई है। आवक नहीं होने से मिलर्स परेशान हैं। -विश्वनाथ, दाल मिलर्स।
दाल की मंडी के लिए चंदौसी की अपनी अलग पहचान थी। अब न तो तब जैसा माहौल रहा और न ही कारोबार में दम रहा। किसानों ने भी दलहन से मुंह मोड़ लिया है। मौसम की मार से फसलें बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। -मेवराम, दाल मिलर्स।
मौसम का प्रभाव दलहनी फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है, इसके साथ ही जनसंख्या के साथ ही दालों की खपत में भी भारी वृद्धि हुई है, जबकि आंकड़े बताते हैंकि दलहनी फसलों का रकबा बढ़ा है। 2013-14 में उड़द का रकबा नौ हजार हेक्टेयर से ब़ढ़कर 14 हजार हेक्टेयर हो गया, अरहर का रकबा 250 से बढ़कर 600 हेक्टेयर हो गया लेकिन उत्पादन प्रभावित हुआ है। -व्यासमुनि मिश्रा जिला कृषि अधिकारी संभल