लाल किले की प्राचीर से गांव-गांव बिजली पहुंचाने के प्रधानमंत्री के एलान की यहां धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बिजली देने के नाम पर लाखों रुपये खर्च हो गए। तार भी खिंच गए।। लेकिन इन इलाकों में अंधेरा कायम है। तारों का उपयोग कपड़े सुखाने में किया जा रहा है। चपतियों की मढ़ैया में आप इसका नजारा देख सकते हैं।
चपतियों की मढ़ैया में 3500 की आबादी को बिजली नसीब नहीं हुई है। गांव के आधे हिस्से में बिजली है और आधे हिस्से में तार के बाद भी करेंट नहीं है। मोबाइल चार्ज करने के लिए भी लोग दूसरे मोहल्लों में जाते हैं। चिरौली भगवंतपुर में पवांसा ब्लाक का गांव है। खंभे गांव में लगे हैं पर बिजली लाइन के दो तार गायब है।
गांव वाले अपना- अपना अर्थ का तार लगाकर बिजली चला रहे हैं। इस गांव में विद्युतीकरण पर लाखों रुपये व्यय हो चुके हैं पर उसका लाभ गांव के लोगों को नहीं मिल सका है। पवांसा के अवर अभियंता विनोद कुमार से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ऐसा कोई गांव उनकी जानकारी में नहीं है। यदि बिजली लाइन का तार गायब है तो तार बदल दिया जाएगा।
इधर, पनसुखा की मिलक में विद्युतीकरण के लिए आजादी के 70 वर्ष बाद भी इंतजार हो रहा है। गांव में विद्युतीकरण के लिए आए खंभे से पड़े हैं।
गांव में घर- घर बिजली आज भी सपना है। गांव में कुछ नलकूप लगे हैं और उनके लिए आई बिजली लाइन से ही लोगों ने घरेलू बिजली के कनेक्शन जोड़ लिए हैं। गांव वालों का सवाल है आखिर कब तक होगा विद्युतीकरण।