मैंथा ऑयल में तेजी की उम्मीद लगाए बैठे किसानों को झटका लगा है। मैंथा की नई फसल से ऑयल के उत्पादन के बाद से लगातार बाजार भाव घट रहे हैं। एक महीने के भीतर मैंथा ऑयल का भाव एक सौ रुपये प्रति किलोग्राम तक नीचे आ चुका है। यह स्थिति तब है जब घरेलू और विदेशी मार्केट में मैंथॉल की लगातार डिमांड बनी हुई है। सभी निर्यातकों के पास आर्डर है और कारखानों में काम चल रहा है।
देश की विभिन्न मैंथा मंडियों में एक दिन में 1400-1500 मीट्रिक टन ऑयल की आवक हो रही है। सीजन से पहले यह आवक 300-400 मीट्रिक टन हुआ करती थी। लेकिन नई फसल ठीक होने के बाद आवक बढ़ी तो इसका कीमत पर असर पड़ा। धीरे-धीरे मैंथा ऑयल का बाजार भाव टूट रहा है। सीजन की शुरुआत के समय एक जून को बाजार भाव 900 रुपये प्रति किलोग्राम था जो अब घटकर 800 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गया है।
इन दिनों संभल 800 और बाराबंकी मंडी में 790 रुपये की दर से मैंथा ऑयल बिक रहा है। अन्य मंडियों में भी दाम में दस-पांच रुपये का ही अंतर है। इससे मैंथा उत्पादक किसानों को इससे करारा झटका लगा है। किसानों का कहना है कि 800 रुपये के मूल्य में तेल बेच कर लागत वसूल करना और मजदूरी निकालना मुश्किल हो रहा है।
मैंथा इंडस्ट्री में तीन वर्ष तक लगातार मंदी रही। स्टाकिस्ट ने भारी नुकसान उठाया है। इसलिए इस बार बाजार भाव टूटने पर भी बाहरी इनवेस्टर और स्टाकिस्ट ने मैंथा की खरीद शुरू नहीं की है। इसलिए इंडस्ट्री में अभी मनी का फ्लो नहीं है। मैंथा आयल की खरीदारी कमजोर है जिससे बाजार भाव थोड़ा सा और टूट सकता है, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं रहेगी। अक्तूबर से बाजार भाव सुधरने के आसार हैं।
अरविंद अरोरा, मैंथॉल प्रोडक्ट के निर्यातक।
मैंथा आयल के भाव में ताजा गिरावट की वजह पैदावार अच्छी होना और तेल की पर्याप्त आवक होना है। मैंथा की फसल पिछले वर्ष के मुकाबले 20-30 प्रतिशत तक ज्यादा हुई है। मेरा मानना है कि आने वाले दिनों में जैसे ही तेल की आवक घटेगी बाजार भाव सुधर सकते हैं। लेकिन फिलहाल तीन से पांच प्रतिशत तक दाम गिरने का अनुमान लगाया जा रहा है। - हिमांशु अग्रवाल, निर्यातक।
किसान बोले- लागत भी निकलना मुश्किल
संभल। मैंथा की जिस फसल पर बहुत सारी उम्मीदें किसानों ने संजों रखीं थी। टूटते बाजार भाव ने उन उम्मीदों को करारा झटका दिया है। छछेरा गांव के किसान तीरथ सिंह सागर ने बताया कि उन्होंने 32 बीघा खेत में मैंथा की फसल लगाई थी। इसमें कुछ जमीन किराये पर ली थी। बाकी जमीन अपनी थी। तेल की औसत रिकवरी 4 किलोग्राम प्रति बीघा रही। मजदूरी का मूल्य जोड़ दें तो लागत 4000 रुपये प्रति बीघा से ज्यादा बैठ रही है जबकि आठ सौ रुपये प्रति किलोग्राम की बिक्री से मात्र 3200 रुपये प्रति बीघा की आमदनी हुई है। इस हिसाब से प्रति बीघा कम से कम एक हजार रुपये का घाटा है। इसी गांव के किसान वीरपाल सिंह तोमर ने बताया कि मौसम ने साथ नहीं दिया। पहले सरसों की फसल कमजोर हुई अब मैंथा ने भी धोखा दिया। पांच से छह किलोग्राम प्रति बीघा रिकवरी की उम्मीद थी लेकिन रिकवरी 4.5 किलोग्राम प्रति बीघा रही। इसलिए घाटा हो रहा है।