चंदौसी (संभल)। कंपनी में रीजनल मैनेजर की नौकरी छोड़कर गवां के आशुतोष प्रताप सिंह ने जैविक खेती की ओर रुख किया तो वे उपहास का केंद्र बन गए, लेकिन सफलता के बाद सभी से सराहना मिली। कठिन परिश्रम और जैविक खेती की बदौलत वह आज एक बड़े कृषि कारोबारी के तौर पर पहचान बना चुके हैं। अपने खुद के मॉडल पर वह लाखों के बारे न्यारे कर रहे हैं। अन्य लोग भी बड़ी तादाद में जुड़कर जैविक खेती के गुर सीख रहे हैं।
गवां निवासी आशुतोष प्रताप सिंह ने नवंबर 2018 में मैनेजर की नौकरी छोड़कर जैविक विधि से खेती करने की ओर कदम बढ़ाया। उनके पास करीब बीस एकड़ जमीन है। शुरुआती सफर कठिनाई से भरा था, अभी तक मजदूरों के माध्यम से सामान्य खेती की जा रही थी। जिस पर रासायनिक खाद बीज में प्रतिवर्ष आठ लाख रुपये से अधिक का खर्चा आता था। सबसे पहले आशुतोष ने जैविक खाद तैयार करने की योजना बनाई। पहला कदम स्वयं ही वर्मी कंपोस्ट खाद बनाने के लिए सेटअप तैयार किया। यहां दो बीघा जमीन पर सामान्य खर्च पर गोबर, घास, पत्तियों और केंचुए से वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार करना शुरू किया। जिसे सबसे पहले प्लांट से तैयार खाद को अपने ही खेत में प्रयोग किया गया। परिणाम अच्छे मिले और धीरे धीरे 80 प्रतिशत तक रासायनिक खाद का उपयोग खेती से घटकर बीस बीस प्रतिशत रह गया। अब जैविक खाद से प्रतिवर्ष आठ लाख रुपये तक की बचत की जा रही है। इसके अलावा जैविक खाद का उत्पाद बढऩे पर आसपास के जनपद व अन्य प्रदेशों में किसानों को निर्यात किया किया जा रहा है। आशुतोष के अनुसार दो बीघा जमीन में प्रतिवर्ष 100 टन से अधिक जैविक खाद तैयार हो रहा है। वह अपने खेती में करीब 50 टन खाद तक उपयोग कर रहे हैं। शेष खाद को वह अन्य किसानों को बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।
मोडीफाई ट्रेच विधि से गन्ने की फसल के साथ सहफसली
इस बार मोडीफाई ट्रेच विधि से चार बीघा जमीन पर गन्ने की फसल व सहफसली के रूप में आलू और लहसुन की फसल बोई है। गन्ना एक वर्ष की फसल है, ऐसे में गन्ने के साथ सहफसली के तौर पर तीन से चार महीने में तैयार होने वाली फसल को लगाकर मुनाफा कमाया जा सकता है। ट्रेच विधि से गन्ने की बढ़वार भी अच्छी होती है। इसके साथ हम एक वर्ष में सहफसली से तीन फसलें उठा सकते हैं। आतुशोष का मानना है कि गन्ने के साथ सहफसली खेती करने से किसान को आर्थिक लाभ पहुंचता है, जोकि सामान्य विधि से गन्ने की खेती करने से कहीं ज्यादा है।
100 रुपये किलो बिक रहा जैविक गन्ने से तैयार गुड़
जैविक गन्ने से तैयार गुड़ की पैकिंग कर आशुतोष उसे बाजार में 100 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से बेचकर आर्थिक लाभ उठा रहे हैं। उनकी जमीन से पैदा होने वाला जैविक गन्ने को वह मिल को आपूर्ति नहीं करते है। उन्होंने अपने ब्रांड बनाए हुए हैं। जिसमें एक किलो गुड़ की पैकिंग 100 रुपये में बिक रही है। इसके अलावा आने वाले समय में मसाला चटनी और आईस्क्रीम भी बाजार में देखने को मिलेगी। इसके लेकर आशुतोष काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जैविक गुड़ से तकरीबन 450 रुपये प्रति क्विंटल गन्ने का रेट मिलता है। गन्ना मसाला चटनी और आइसक्रीम से 800 रुपये प्रति क्विंटल तक का रेट मिलता है।
एक बार बोई नेपियर घास
आशुतोष खेतीबाड़ी के साथ ही पशु पालक भी हैं, उनके घर छोटे-बड़े बीस मवेशी हैं। पशुओं के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हरा चारा है। उन्होंने पशुओं के लिए छह बीघा जमीन में थाई नेपियर घास तैयार की है। जिससे एक साल में एक हजार क्विंटल हरा चारा मिल जाता है। सबसे बड़ी बात इस नेपियर घास में यह है कि उसे बार-बार बोना नहीं पड़ता। वह नेपियर घास की बिक्री करके भी मुनाफा कमा रहे हैं। नेपियर घास से पशुओं को आवश्यक पोषक भी मिलते हैं। जमीन के चारों ओर मेड़ पर भी नेपियर घास लगाई हुई है।
बीघा जमीन से खाद ही नहीं सब्जी भी मिल रही
आशुतोष ने जिस दो बीघा जमीन पर जैविक खाद बनाने की व्यवस्था की है। उसी जमीन से वह तोरई की फसल लगाते हैं। जैविक खाद के सेट पर ऊपर तोरई के बेल लगाते हैं। यह माह में करीब 60 हजार रुपये की तोरई बिक जाती है। इसके अलावा बगान कर रहे हैं, जिसमें नीबू, संतरा, करौंदा जैसे पेड़ों से मुनाफा कमाया जा रहा है।