संभल-मुरादाबाद मार्ग पर सिरसी तक और संभल से बहजोई-हसनपुर मार्ग पर चौधरी सराय तक भीड़ के साथ वाहनों का काफिला था। जगह-जगह जाम की नौबत थी। संभल के चंदौसी चौराहे पर तमाम ट्रैफिक पुलिस होने के बाद भी ट्रैफिक कंट्रोल नहीं हो पा रहा था क्योंकि वाहनों की संख्या ही इतनी ज्यादा थी। संभल-मुरादाबाद मार्ग पर जाम लगा। संभल जोया मार्ग पर असमोली तक जाम की स्थिति देर शाम तक बनी रही। ट्रैफिक रेंग रेंग कर चला।
जाम न लगे, इसके लिए दीनी इजेत्मा में पूरा इंतजाम किया गया। दुआ से पहले ही एलान लगाया गया था कि सबसे पहले पैदल वाले निकलेंगे। उनके लिए एक घंटे का समय मुकर्रर किया गया लेकिन पैदल वालों की तादात इतनी ज्यादा थी कि छह घंटे तक भी वाजिदपुरम से संभल-मुरादाबाद मार्ग को जोड़ने वाली सड़क खाली नहीं हुई। दोपहर दो बजे के बाद आटो और बाइक वाले निकाले गए। इसके बाद चार बजे से बसों और बड़े वाहनों को रास्ता दिया गया। बसों की संख्या इतनी अधिक थी कि रास्ते में जाम के हालात बन गए। संभल से किसी भी तरफ की सड़क हो। रात्रि आठ बजे तक जाम के हालात थे। ट्रैफिक को सामान्य करने के लिए पुलिस तथा प्रशासन को पसीना आ रहा था।
इज्तिमा में खत्म हुई व्यस्तता अब अपने-अपने काम पर लौटेंगे लोग
संभल। इज्तिमा की तैयारियों में ढाई महीने तक अपना वक्त देने वाले हजारों लोग अब खाली हो जाएंगे। दीनी इज्तिमा की तैयारी और वहां सुनीं गईं तकरीरों के आधार पर उनमें काफी कुछ बदलाव आया है। वे अपनी जिंदगी को अब दीन के मुताबिक बिताने का इरादा कर चुके हैं।
संभल के वाजिदपुरम में 24 से 26 दिसंबर तक दीनी इज्तिमा हुआ लेकिन इसकी तैयारी ढाई महीने पहले ही शुरू हो चुकी थी। संभल, सरायतरीन और मुरादाबाद के लोग सबसे ज्यादा तैयारियों में सक्रिय थे। इज्तिमा खत्म होने के बाद दिन में तीन बजे जब अमर उजाला टीम ने ऐसे कुछ लोगों से बातचीत की तो उनका कहना था कि यहां आकर बहुत बड़ा बदलाव हमारे जीवन में आया है। अब हम तब्लीगी जमात में शामिल होकर दीनी तालीम हासिल करने का इरादा कर चुके हैं।
उम्मत की खैर के लिए उठे लाखों हाथ
इज्तिमा का आखिरी दिन। दुआ का वक्त। वाजिदपुरम में बसे तंबुओं के शहर में जहां तक नजर दौड़ाए वहां तक अकीदतमंद ही अकीदतमंद। दोपहर बारह बजे शुरू हुआ दुआओं का सिलसिला घंटेभर तक चला। बारगाह-ए-इलाही में हर आंखें नम थी तो खुदा की रजा को दिल बेचैन था। उम्मत की खैर के लिए लाखों हाथ एक साथ उठे। कुछ ऐसा नजारा था दुआ के दौरान इज्तिमा का। पूरे आलम में अमनो-अमान कायम रखने, इंसानियत को कुफ्र से बचाने, पांच वक्त का नमाजी बनाने, दीन के रास्ते पर चलने, उम्मत की सलाती की दुआ मांगी गई। जिसपर अकीदतमंदों ने नम आंखों से आमीन आमीन... कहा।
इज्तिमा के आखिरी दिन सोमवार को दुआ वक्त 41 लाख वर्ग फुट में बने शामियाना भी अकीदतमंदों के आगे छोटा पड़ गया। तब्लीगी जमातों और आसपास के इलाकों से आए लोगों को शामियाने के बाहर खुले आसमान के नीचे जगह लेनी पड़ी। वाजिदपुरम में बसा तंबुओं का पूरा शहर अकीदतमंदों से भर गया। जहां जिसको जगह मिली वहां बैठकर दुआ में शरीक हो गया। दोपहर बारह बजे दुआ की शुरुआत हुई। जो घंटेभर तक चलता रहा।
हर किसी ने बारगाह-ए-इलाही में अपनी गुनाहों की माफी मांगी। दुआओं में अल्लाह को राजी करने के लिए मुसलमानों की आंखें भर आई। हर दुआ के साथ अकीदतमंद आमीन कहते रहे। दुआ के बाद जोहर की नमाज अदा की गई। इसके बाद तब्लीगी जमातों केे साथ अकीदतमंदों के जाने का सिलसिला शुरू हो गया। देर शाम तक अकीदतमंद वाजिदपुरम से निकलते रहे।
पहले नहीं देखा इतना बड़ा इज्तिमा
संभल। चौतरफा मुसलमान ही मुसलमान। तंबुओं का शहर। हर कोई अल्लाह की बंदगी में मशगूल। हर कोई एक दूसरे के लिए सहयोगी। ऐसा माहौल दीनी इज्तिमा में बना जो यादगार हो गया। जिन लोगों से भी बात हुई, वे यही बोले- इतना अच्छा और बड़ा इज्तिमा पहले कभी नहीं देखा। खासकर संभल के लोगों के लिए यह इज्तिमा यादगार है। संभल के मियांसराय निवासी शिक्षक इकराम अली खां कहते हैं कि बिना किसी भेदभाव के सब साथ थे और एक सफ में नमाज अदा कर रहे थे। इंतजामिया में 50 दिन तक लगे रहे नाजिम एडवोकेट ने कहा कि संभल के लोगों को यह इज्तिमा मिला। यह यहां की खुशनसीबी थी। उससे भी बड़ी खुशनसीबी यह है कि सबने मिलकर काम किया और अल्लाह के करम से आयोजन सकुशल संपन्न हो गया। यह यादगार रहेगा। अब उन्होंने 40 दिन की जमात में जाने का इरादा बनाया है।
साझा किया एहसास
मैं 50 दिनों से इज्तिमा की तैयारियों में सक्रिय रहा। मैंने यहां पर बहुत कुछ सीखा है। जमात में जाने का इरादा बनाया है। अपने पहनावे को भी चेंज करूंगा।
- मुशय्यद हसन, दीपासराय।
एक नवंबर से प्रतिदिन यहां आ रहे थे। अभी एक दो दिन का काम और है। इसके बाद अपने घरेलू और कारोबारी काम करेंगे लेकिन अब हमारी जिंदगी काफी कुछ बदल चुकी है। ऐसे दीनी इज्तिमे इंसानियत के लिए जरूरी हैं।
- जाकिर हुसैन, दीपासराय।
मैंने मौलाना साद की तकरीर सुनी। अब मैं जिंदगी की भागदौड़ से वक्त निकाल कर दीनी फर्ज भी अंजाम दूंगा। नमाज तथा रोजे का पाबंद बनूंगा।
- इकराम अली खां, मियांसराय।