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आबादी से दूर, खादर क्षेत्र में घुसा बाढ़ का पानी, रात को पानी बढ़ने की संभावना

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ुनावई के गंगा खादर क्षेत्र में बाढ़ के पानी से चारा लेकर लौटे किसान - फोटो : CHANDAUSI
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चंदौसी। पहाड़ी क्षेत्रों में हो रही बारिश से गंगा उफनाई हुई है। नरौरा बैराज से सोमवार की शाम को 2.23 लाख क्यूसेक पानी डिस्चार्ज किया गया। अभी खादर में बाढ़ प्रभावित गांवों में आबादी से दूर जंगल में किसानों की फसल में बाढ़ का पानी घुस गया है। प्रशासन ने किसानों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में जाने पर रोक लगा दी है। बाढ़ चौकी पर तैनात स्टाफ को निर्देशों का पालन कराने की सख्त हिदायत दी गई है।
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रविवार की शाम 1.71 लाख क्यूसेक पानी नरौरा बैराज से डिस्चार्ज किया गया। सोमवार की सुबह छह बजे 2.23 लाख क्यूसेक पानी नरौरा बैराज से छोड़ा गया। शाम चार बजे तक जुनावई के खादर क्षेत्र के गांव रघुपुर पुख्ता, समसपुर, बझांगी, सालिंग की मढ़ैया आदि गांव के गंगा के तटवर्टी जंगल में बाढ़ का पानी घुस गया। किसानों की मेंथा, बाजरा व चारे की फसल बाढ़ के पानी में डूब गईं। हालांकि बाढ़ का पानी अभी आबादी से करीब 800 मीटर दूर है। रात में गंगा का जलस्तर बढ़ने की संभावना हैं। ऐसे में बाढ़ का पानी आबादी की ओर बढ़ जाएगा। प्रशासन पूरी नजर बनाए हुए हैं।
बाढ़ क्षेत्र के खेतों में जाने पर रोक
चार गांवों के जंगल क्षेत्र में बाढ़ का पानी भरा है। किसानों ने फसल की रखवाली के लिए खादर में खेतों पर झोपड़ी बनाकर रखी हैं। दिन में चारा लेने के लिए जाते हैं और आराम भी कर लेते हैं। ऐसे में तहसील प्रशासन ने बाढ़ चौकियों पर तैनात स्टाफ को सख्त हिदायत दी है कि ग्रामीणों को सचेत रखें। साथ ही बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के खेतों में किसी भी समय न जाने दें। हालांकि सोमवार को कुछ किसान चोरी छुपे खेेतों से चारे की व्यवस्था के लिए गए थे।
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जंगल में जाना मजबूरी
रघुपुर पुख्ता निवासी किसान गोपाल सिंह, सुरेंद्र सिंह, फतेहचंद, वीरेंद्र सिंह, नत्थू सिंह ने बताया कि किसानों को पशु का पेट भरने के लिए हरे चारे की आवश्यकता है। अधिकांश किसानों की जमीन खादर क्षेत्र में है। मजबूरी में किसानों को हरे चारे की व्यवस्था के लिए जंगल में जाना पड़ता है।
बाजरा, मेंथा व हरे चारे की फसल पर संकट
खादर क्षेत्र के अधिकांश खेतों में गन्ने की फसल है। इसके अलावा मेंथा, बाजरा व हरे चारे की बुआई भी किसानों ने की है। इस फसल में बाढ़ का पानी भरने से किसानों को नुकसान होगा। मेंथा की फसल पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी। तीन दिन तक पानी भरा रहने से हरे चारा व बाजरा भी नीचे से गलने लगेगा। किसान इसको लेकर चिंतित है।
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