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किसानों ने धान के खेतों में डाला कीटनाशक, दुर्लभ प्रजाति के हिरण खतरे में

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संभल। पवांसा क्षेत्र के तीस से अधिक गांव ऐसे हैं जहां के जंगलों और खेतों की ओर दुर्लभ प्रजाति के काले हिरण विचरते दिख जाते हैं लेकिन इन दिनों खेतों में सिंचाईं के वक्त पानी के साथ डाले जाने वाले कीटनाशक से इन हिरणों की जान को खतरा है। एक मादा हिरण की मौत हो चुकी है। लेकिन अभी तक न तो किसान चेते हैं न ही वन विभाग और तहसील प्रशासन। दूसरे हिरण भी किसी भी समय मौत का शिकार हो सकते हैं। वन विभाग हिरण का पोस्टमार्टम कराने तक सीमित हैं। लेकिन हिरण कैसे बचेंगे यह सवाल बरकरार है।
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हिरणों को धान के खेतों में पानी के साथ कीटनाशक लगाए जाने से जान का खतरा है। आमतौर पर जब पोखर और पानी के दूसरे स्रोत सूख जाते हैं तब हिरणों को जंगलों में पीने का पानी नहीं मिल पाता है। हिरणों का रुख पीन के पानी के लिए खेतों में सिंचाईं के वक्त लगाए जाने वाले पानी की तरफ हो जाता है। वह खेतों में धान की सिंचाईं के लिए लगाए गए पानी को पीते हैं। पानी के साथ कीटनाशक दवाओं और खाद का इस्तेमाल होता है।
अगर हिरण इस पानी का सेवन करते हैं तो कुछ ही देर में वे सुस्त पड़ने लग जाते हैं। कई बार बेहोशी आ जाती है और हिरण इतने ज्यादा शिथिल पड़ जाते हैं कि दौड़ने की क्षमता खत्म हो जाती है। इस दौरान उन पर खूंखार कुत्तों के हमले हो जाते हैं। हमले में वह अपना बचाव नहीं कर पाते हैं। कुत्ते जख्मी हिरणों के शरीर का मांस नोच लेते हैं। ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं। इससे कई दुर्लभ हिरणों की जान चली गई है।
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अभयारण्य बने तो बच सती है काले हिरणों की जान
संभल। काले हिरण भले ही दुर्लभ हों पर अभी तक उनकी जान बचाने के लिए संभल जिले में कोई पहल नहीं हुई है। अमर उजाला समय-समय पर इस मुद्दे को उठाता रहा है लेकिन वन विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने गौर नहीं किया। नतीजा हिरणों की जान जा रही है। अब अगर हिरणों की जान बचाने के लिए अभयारण्य बनाया जाता है और जिलाधिकारी अभयारण्य के लिए जमीन दिलाने की पहल करते हैं तो कुछ सार्थक परिणाम निकल सकता है।
ऐसी उम्मीद उन तमाम ग्रामीणों को है जो अपने क्षेत्र में सामने दिखने वाले हिरणों का कभी शिकार नहीं करते बल्कि उनके संरक्षण के लिए वर्षों से प्रयास करते चले आ रहे हैं। खूंखार कुत्तों के हमलों में घायल हिरणों की जान बचाने के लिए भी यही ग्रामीण आगे आते हैं। लेकिन फिर भी कुछ हिरण मौत का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में संरक्षण किए जाने के लिए अभयारण्य बनाए जाने की जरूरत है। इस बारे मेें जब डीएफओ से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि सौ से दो सौ हेक्टेयर जमीन चाहिए जो काले हिरणों के अभयारण्य के काम आए। अभयारण्य बनाने पर हिरणों की जान बच सकती है।
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