सदियों से समाज में यह धारणा है कि यदि मृत्यु के समय मुंह में गंगा जल की कुछ बूंदे पड़ जाएं या फिर अंतिम संस्कार पतित पावनी गंगा के निर्मल जल में हो तो मोक्ष मिलना तय है। लेकिन लगातार बढ़ते प्रदूषण ने राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) को भी इस पुरानी मान्यता पर चोट करने को विवश किया है।
उत्तर प्रदेश शासन के नगर विकास विभाग के बाद नगरीय निकाय निदेशालय के निदेशक ने जिलाधिकारी के माध्यम से गंगा किनारे स्थित सभी स्थानीय निकायों के अधिशासी अधिकारियों को गंगा व उसकी सहायक नदियों में शव प्रवाह पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए हैं।
गंगा में प्रदूषण का मुद्दा तो सड़क से संसद तक लंबे समय से गूंजता रहा है, अरबों की धनराशि भी व्यय हुई है लेकिन गंगा में प्रदूषण कम नहीं हुआ है। राष्ट्रीय हरित अभिकरण ने 18 जनवरी-2016 को आदेश जारी करके गंगा में शव का प्रवाह रोकने को कहा था। जिस पर नगर विकास विभाग के सचिव ने एक फरवरी को शासनादेश जारी कर दिया।
तीन फरवरी को नगरीय निकाय निदेशालय के निदेशक अविनाश कृष्ण ने गंगा व उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे सभी नगर निगमों, नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों के अधिशासी अधिकारियों को आदेश दिया है कि वह गंगा व उसकी सहायक नदियों में शवों का प्रवाहित किए जाने पर प्रतिबंध लगाएं।
चंदौसी के अधिशासी अधिकारी संजय कुमार गौतम ने बताया कि शासनादेश के अनुपालन में कार्रवाई की जाएगी। गंगा जिले की सीमा से गुजरती है, गवां नगर पंचायत क्षेत्र के छू कर जाती है लेकिन अन्य शहरी क्षेत्र तो गंगा की तलहटी से दूरी पर हैं। जिलाधिकारी की ओर से ही इस बाबत दिशा निर्देश जारी किए जाएंगे।