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विलुप्त होती पौधों की प्रजातियों को बचाने को बनेगा फारेस्ट म्यूजियम

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built museum for rare plants in chandausi
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चंदौसी। प्रकृति का वह औषधीय एवं पर्यावरणीय, सुगंधित सौंदर्य कभी हमारे आसपास था। भले ही हमें उनके गुणों की जानकारी नहीं थी, लेकिन आज वह वन प्रजातियां लुप्त हो चली हैं। मूसली हो या फिर लाल चंदन, इबोनी हो या फिर सुगंधित फूलों की अन्य प्रजातियां, जिनके बल पर देश आयुर्वेद का जनक बना लेकिन अब वह हमारे आसपास नहीं है। लेकिन अब जिले में विलुप्त होती प्रजातियों के पेड़-पौधों को संरक्षित करने के लिए एक नई पहल शुरू होने जा रही है। जिलाधिकारी ने संभल जिले में फारेस्ट म्यूजियम बनाने का निर्णय लिया है। सब कुछ ठीक ठाक रहा तो इस अनोखे वन संग्रहालय में उन प्रजातियों के पौधे भी देखने को मिलेंगे, जो अब बहुत कम दिखाई देते हैं या फिर लुप्त हो रहे हैं।
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संजीवनी बूटी वाले इस देश में औषधीय पौधों की खान थी। जो हमारे ही आसपास थे। लेकिन मौजूदा मिट्टी, जलवायु परिस्थितियां, वायु प्रदूषण, दूषित पानी, प्लास्टिक उपयोग, बढ़ता शहरीकरण, हमारी असंवेदनशीलता आदि कई ऐसे कारण हैं, जिसकी वजह से कई प्रजातियां तेजी के साथ विलुप्त हो रही हैं। देश में प्रकाशित अध्ययनों के मुताबिक देश में वनस्पतियों की 49 हजार से अधिक प्रजातियां हैं। इसमें 12 प्रतिशत प्रजातियां मानव जाति के कल्याण के लिए हैं। इनमें 16 हजार प्रजातियां फूलों की हैं। यह दुनिया में पाए जाने वाले कुल फूल के पौधों का करीब सात फीसदी है।
गंगा पर महाआरती शुरू कराने, सोत नदी व महावा नदी को पुनर्जीवित कराने के प्रयास कर अपने प्रकृति प्रेमी होने का परिचय देने वाले संभल के जिलाधिकारी अविनाश कृष्ण सिंह ने बताया कि कई अध्ययनों पर नजर डालने के बाद यह विचार आया कि विलुप्त होती पेड़-पौधों की प्रजातियों को बचाना आवश्यक है। अन्यथा जो पेड़ पौधे शेष बचे हैं, वह भी नष्ट हो जाएंगे।
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इसलिए वन विभाग समेत विभिन्न विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक करके तय किया गया कि जिले में एक फारेस्ट म्यूजियम का निर्माण किया जाए। इसके विलुप्त होती प्रजातियों के पेड़-पौधों को संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली नस्लों के उन पेड़ पौधों की जानकारी भी हो सके, जो आज के लोगों ने तो देखे हैं लेकिन आने वाली नस्लें शायद नहीं देख पाएंगी। इन संरक्षित पौधों से उन प्रजातियों को बचाया जा सकेगा। इसके लिए रजपुरा के सिसौना डांडा में भूमि चयनित कर ली गई है। वहां पर सभी तैयारियां करने के निर्देश दिए गए हैं। यह भूमि गंगा के किनारे होने के कारण पेड़ पौधों के लिए बेहद उपयुक्त भी रहेगी।
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