बहजोई। बहजोई से करीब सात किलोमीटर दूर गांव सादात बाड़ी का प्राचीन पातालेश्वर महादेव मंदिर करीब सवा सौ साल पुराना है। मंदिर परिसर में हर साल फाल्गुन व श्रावण मास में शिवतेरस पर मंदिर में पवित्र शिवलिंग में जलाभिषेक कर कांवड़ चढ़ाई जाती है। मान्यता है कि चर्म रोग से मुक्ति के लिए श्रद्धालु शिवलिंग पर नारियल की झाड़ू चढ़ाते हैं।
मंदिर के महंतों में प्रेम गिरि की ओर से लिखित प्राचीन पातालेश्वर शिव मंदिर सादात बाड़ी (धीमर बारी) जिला संभल का इतिहास नामक पुस्तक में बताया गया है कि पहले मंदिर के स्थान पर ढाक, बेरी, खजूर व पतेल आदि का विशाल जंगल हुआ करता था। अंग्रेजी हुकूमत में जमींदारी प्रथा थी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भगवान शिव पातालेश्वर बाबा इस स्थान पर प्रकट हुए थे।
गांव के ग्वालों आदि ने पहली बार देखा, तो महज एक पत्थर समझकर खुरपी रगड़ते हुए धार तेज करने का प्रयास किया। तभी ग्वालों को चुंबकीय शक्ति का एहसास हुआ और शरीर में कंपन होने लगा। इसके बाद ग्रामीणों ने बुजुर्गों आदि के सुझाव पर आसपास साफ-सफाई कर मिट्टी का चबूतरा बना दिया और भजन-कीर्तन करने लगे। बाद में, इस स्थान पर मठिया बनाकर गांव व आसपास के लोग भगवान शिव की पूजा-पाठ करने आने लगे।
बहजोई के साहू भिखारी दास ने 7 सितंबर 1902 में मंदिर का निर्माण शुरू कराया था। निकट ही कुआं व प्याऊ भी बनवाया। इसके बाद से अन्य श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर को और भी भव्य बनाने में सहयोग किया। इसके अलावा आसपास कई धर्मशालाएं व बरामदे बनवाए। यहां शिवतेरस पर भजन-कीर्तन व भंडारा होता है। वहीं, फाल्गुन व श्रावण मास की शिवतेरस पर कांवड़िये गंगाघाट से जल लाकर शिवलिंग पर कांवड़ चढ़ाते हैं।
संभल समेत आसपास के जिलों में अलीगढ़, बुलंदशहर, बदायूं, अमरोहा व मुरादाबाद आदि जिलों से भी श्रद्धालु मंदिर में शिवलिंग पर जलाभिषेक को पहुंचते हैं। साथ ही, श्रद्धालु दंडवत भी मंदिर में आकर जलाभिषेक करते हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में लगे मेले में दो से तीन लाख तक श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।
चर्म रोग से मुक्ति व संतान प्राप्ति के लिए भी श्रद्धालु मांगते हैं मनौती
पुस्तक के मुताबिक कि चर्म रोग से मुक्ति के लिए श्रद्धालु मंदिर में शिवलिंग पर नारियल की झाड़ू चढ़ाते हैं। लोग अपनी मनौती पूरी होने के बाद परिवार समेत मंदिर में आकर शिवलिंग की जलहरी दूध से भरते हैं। संतान प्राप्ति के लिए पहले महिलाएं मंदिर के पीछे गाय के गोबर से सतिये (स्वास्तिक) व सूर्य-चंद्रमा का चिह्न बनाकर मनौती मांगती हैं। मनौती पूरी होने पर गोबर के सतिये व सूर्य-चंद्रमा का चिह्न मिटाकर श्रद्धा व सामर्थ्य के मुताबिक बाबा के दरबार में चांदी-सोने के सतिये व सूर्य-चंद्रमा बनवाकर मंदिर में चढ़ाते हैं।