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भक्ति में सराबोर हुआ हरिबाबा बांध आश्रम, निभाई जा रही वर्षों पुरानी परंपरा

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बबराला/गवां। गुरु पूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर प्रसिद्घ धार्मिक स्थल हरिबाबा बांध धाम भक्ति के माहौल में रंग गया है। अनवरत रूप से चल रहे विभिन्न कार्यक्रम व भगवान की लीलाओं के मंचन को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्घालु धाम पर पहुंच रहे है। सात दिन तक चलने वाले गुरू पूर्णिमा महोत्सव में वर्षों पुरानी परंपरा निभाने के साथ-साथ दूर-दराज से आए हरिबाबा के भक्त श्रमदान करते नजर आए। दर्जनों हरिभक्तों ने मन्नत पूरी होने पर विशाल भंडारे का आयोजन किया।
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जिले में कस्बा गवां के निकट मोलनपुर गांव पर स्थित पर प्रसिद्घ तीर्थस्थल हरिबाबा बांध धाम पर शुरू हुए गुरू पूर्णिमा महोत्सव में दूसरे दिन सुबह नौ बजे से दो बजे तक भक्त मीराबाई की लीला का मंचन हुआ। जिसमें मथुरा से आए कलाकारों ने भगवान श्रीकृष्ण की लीला का मंचन करते हुए दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इसके बाद श्रीमद्भागवत कथा और रात्रि में राम जन्म का लीला का मंचन हुआ। गुरु पूर्णिमा के महोत्सव में रंगमंच को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्घालु बांध धाम पहुंचे। जहां हरिबाबा बांध आश्रम के दर्शन कर मन्नत मांगी और गंगा में स्नान किया। इसके बाद प्रसाद का वितरण किया।

भक्त प्रहलाद और समुद्र मंथन की कथा सुनाई
बबराला/गवां। हरिबाबा बांध आश्रम पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा में भक्त प्रहलाद व समुद्र मंथन की लीला का वर्णन हुआ। इसे सुन भक्त मंत्रमुग्ध हो गए।
आचार्य श्याम विष्णु ने बताया कि हिरण्यकश्यप का एक भाई हिरण्याक्ष था। हिरण्यकश्यप जैसे ही तपस्या करने गया तो उसके भाई का भगवान विष्णु ने वध कर दिया था। तपस्या पूर्ण करके आने के बाद भाई के वध की सूचना पर हिरण्याकश्यप को हरि नाम से बैर हो गया था। वह हरि भगवान को अपना दुश्मन मानता था। कुछ दिन बाद पत्नी गयाधु से एक पुत्र हुआ जिसका नाम प्रहलाद रखा। प्रहलाद भगवान हरि का जप करने लगे। जिसका हिरण्यकश्यप घोर विरोध करता था। अथक प्रयास के बावजूद प्रहलाद ने हरि बोल का जप नहीं छोड़ा तो हिरण्यकश्यप ने उसे मारने का फैसला कर लिया। पहले पहाड़ों से गिरवाया फिर सांपों से कटवाया और जहर भी पिलवाया लेकिन भगवान की भक्ति में प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। इसके बाद उसे होलिका की गोद में बैठाकर अग्नि में विलीन करना चाह लेकिन प्रहलाद बच गए। जब प्रहलाद को लोहे के गर्म खंभे से बंधवाया तो उसमें से भगवान विष्णु नरसिंह अवतार धारण कर निकले और हिरण्यकश्यप का वध किया। साथ ही समुद्र मंथन की कथा का वाचन करते हुए बताया कि देवतओं व दैत्यों के बीच समुद्र मंथन के बाद निकले विष के कलश को लेकर संघर्ष चल रहा था जिसे भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए अपने गले में धारण कर लिया था। तभी उनका नाम नीलकंठ महादेव कहलाया। जिसके बाद अमृत कलश को हथियाने का संघर्ष चल रहा था। भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर उनके दैत्यों के हाथों से अमृत का कलश हासिल कर लिया था।
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बांध पर डाली मिट्टी, निभाई वर्षों पुरानी परंपरा
बबराला/गवां । मान्यता है कि खादर क्षेत्र बहने वाली गंगा नदी के पानी से यहां के लोगों को मुसीबतों को सामना करना पड़ता था। हर वर्ष बाढ़ आती थी और लोगों को कच्चे मकान खाली कर ऊपरी स्थानों पर जाना पड़ता था। सन 1916 में पंजाब के होशियारपुर से आए बाबा हरिबाबा महाराज ने बाढ़ के रूप को देखा तो ग्रामीणों को अपने साथ एकत्रित कर बांध बनाने का साहसिक फैसला लिया और जिस काम को हुकूमत न करा सकी उसी गवां क्षेत्र में गंगा नदी पर एक बड़े बांध को बनवाया था। जिसकी वजह से आज खादर क्षेत्र में खेती होती है। लोग अपने आशियाने बनाकर रहते है। लोगों की मान्यता कि इस बांध पर मिट्टी डालने से मन्नत पूरी होती है, जिसके चलते उनके भक्तों ने हर साल पुरानी परंपरा निभाते हुए अपनी गोद में मिट्टी भरकर बांध पर डालते है।
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