संभल। मुकद्दस माह रमजान का आखिरी अशरा चल रहा है। इस अशरे में ही जहन्नुम की आग से निजात की दुआ मांगी जाती है। हर बालिग के लिए रोजा रखना फर्ज है। इसके लिए कहीं कोई छूट नहीं दी गई है। मजबूरी और बीमारी होने पर कुछ नियम के मुताबिक रोजा कजा यानी छोड़ा जा सकता है। लेकिन उसके लिए शरीयत के नियम का पालन करना होता है। मजबूरी खत्म होने पर छूटा हुआ रोजा रखना होता है।
यदि किसी ने जानबूझकर रोजा छोड़ा है तो उसके लिए अलग नियम हैं। साथ ही छूटे रोजे को रखने का हुक्म है। मौलाना नईम अशरफ बताते हैं कि रोजा हर बालिग पर फर्ज है। मजबूरी में शरीयत की तरफ से कुछ छूट दी गई है।
बुजुर्ग रोजे रखने की हालत में नहीं हैं तो उन्हें हर छूटे हुए रोजे के बदले 2 किलो 50 ग्राम गेहूं गरीब को देना होगा। जब मजबूरी खत्म हो जाएगी तो छूटे हुए रोजे भी रखने होंगे। मौलाना ने बताया कि जिस व्यक्ति ने जानबूझकर एक रोजा छोड़ दिया तो शरीयत का हुक्म है कि उस व्यक्ति को 60 गरीब लोगों को खाना खिलाना होगा। ईद के बाद छूटा हुआ रोजा भी रखना होगा। शरीयत द्वारा बताए गए जुुर्माने को फिदिया कहा जाता है। रमजान के महीने में रोजा रखने का सवाब ज्यादा होता है। आम दिनों में रोजे का सवाब रमजान के बराबर नहीं मिलता।