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जायरीनों की मामू मौला बख्श में गहरी आस्था

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गंगोह में हजरत कुतब-ए-आलम की दरगाह पर कव्वालियां प्रस्तुत करते कव्वाल - फोटो : SAHARANPUR
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जायरीनों ने मनाया हजरत कुतब-ए-आलम का उर्स
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गंगोह। हजरत कुतब-ए-आलम के 496वें उर्स पर मंगलवार को दरगाह पर भीड़ उमड़ पड़ी। हरियाणा, पंजाब और प्रदेश के अनेक जिलोें से जायरीन उर्स मनाने के लिए पहुंचे। जायरीनों ने उर्स पर दुआएं मांगीं। इसके अलावा मामू मौला बख्श का भी उर्स मनाया गया। इस दौरान हजरत कुतब-ए-आलम की दरगाह रोशनी से नहाई हुई थी।
सराय पट्टी क्षेत्र में हजरत कुतब-ए-आलम के अलावा हजरत शेख सादिक, अबू सईद साहब के भी मजार हैं। ये सभी पाक रूहें हजरत कुतब-ए-आलम के खानदान से भी ताल्लुक रखती हैं। मामू मौला बख्श हजरत शेख सादिक के शिष्य थे। मामू मौला बख्श के बारे में बताया जाता है कि जिस समय वह गंगोह आए, उस समय उनकी उम्र मात्र 12 साल थी। यहां आने से पहले उन्होंने ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के दरबार में हाजिरी दी। वहीं से गरीब नवाज ने उन्हें गंगोह जाने की बात कही। यहां आकर उन्होंने अपनी सारी उम्र अपने मुरशीद के यहां गुजार दी। मामू जिन्नात को बुलाने के इल्म व अमल में कामिल थे। मामू के मजार के पास ही लाडो रानी की मजार है। लाडो रानी कौन थीं, इसके बारे में कई चर्चाएं हैं। मौला बख्श को मामू क्यों कहा गया, इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है।
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गद्दी का आयोजन किया
मामू मौला बख्श को मानने वालों ने जगह-जगह गद्दी का आयोजन किया। जायरीनों ने यहां मुरादें मांगी। गद्दी मजार परिसर के अलावा जायरीनों के लिए ठहरने के अनेक जगह इंतजाम किए गए। कव्वालों ने कव्वाली भी पेश की। कव्वालियों का दौर रात भर चलता रहा।
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