सहारनपुर में चुनावी समर में नामांकन के बाद अब राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों को िभतरघात का खतरा सताने लगा है। भाजपा ने जिले की सात सीटों में चार पर दूसरे दलों से आए नेताओं को उतारकर कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया है।
तो सपा और कांग्रेस गठबंधन से इन दोनों दलों के दावेदार निराश हुए हैं। ऐसे में अब पार्टी के नेताओं को अपने ही लोगों से मिलने वाली चुनौतियों से निपटना होगा। उधर, बसपा भी अपने कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की चुनौती से जूझ रही है।
विधानसभा चुनाव में अब राजनीतिक दलों के सामने िभतरघात का खतरा है। कारण, टिकट के अनेक दावेदारों को इस बार निराशा हाथ लगी है। भाजपा ने बाहरियों पर भरोसा दिखा दिया तो सपा और कांग्रेस गठबंधन को उसके अपने कार्यकर्ता पचा नहीं पा रहे हैं।
ऐसे में अब नाराज कार्यकर्ताओं का मनाने में भी प्रत्याशी और पदाधिकारी जुटने लगे हैं। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बेहट से बसपा विधायक महावीर राणा, नकुड़ विधायक धर्म सिंह सैनी, कांग्रेस के गंगोह विधायक प्रदीप चौधरी और पूर्व विधायक मनोज चौधरी ने भाजपा का दामन थामा।
दूसरे दलों से बगावत कर भाजपा में शामिल हुए तीन विधायक और एक पूर्व विधायक को पार्टी ने न केवल हाथों-हाथ लिया। बल्कि चुनाव में उन्हें प्रत्याशी भी बना दिया।
ऐसे में भाजपाई नाराज है और उन्हें मनाना पार्टी के लिए चुनौती है। ऐसे ही गठबंधन के चलते सपा पांच सीटें कांग्रेस को दो दी। देवबंद सीट पर कांग्रेस छोड़ सपा में आए विधायक माविया अली पर सपा ने दांव लगाया।
ऐसे में पहले से घोषित प्रत्याशी बागी तेवर अपनाए हुए हैं। कांग्रेस में टिकट घोषणा के बाद उपजा विवाद जगजाहिर है। देवबंद सीट सपा के खाते में जाने के बाद यहां से घोषित प्रत्याशी को बैकफुट पर आना पड़ा।
इससे अलग दलित मतों में सेंधमारी के लिए सभी दल जुटे हैं। ऐसे में इन भी राजनीतिक दलों को मौजूदा वक्त में अपनों से निपटने की चुनौती से जूझना पड़ रहा है।