सहारनपुर। तंगहाली घर में है, मजबूरी है हालातों की, मगर लेखन की धार कुंद नहीं हुई। परिस्थितियां विपरीत सही, पर सुधीर परवाज ने लिखना जारी रखा है। 35 साल हो गए उन्हें हिंदी में गजल लिखते हुए।
तीन जनवरी 1956 को सहारनपुर के जाटवनगर में मां फूलवती और पिता मुरली सिंह के घर में जन्मे सुधीर परवाज का तंगहाली और परेशानियों से बचपन से ही नाता है। जब वह नौ वर्ष के थे तो पिता मुरली सिंह का देहावसान हो गया था। पढ़ने लिखने की उस उम्र में ही सुधीर परवाज को बूट पॉलिश तक करनी पड़ी। उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाए, लेकिन लेखन की जो चाह दिलो दिमाग में थी, वह थमी नहीं। पिता की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी भी उठाई और लेखन भी जारी रखा। पत्र पत्रिकाओं और समाचारपत्रों में उनकी गजलें प्रकाशित होने लगीं तो लेखन के प्रति हौसला और बढ़ता गया। आज भी परिवार की माली हालत तंग है, शूज बनाने का काम करके आजीविका चलती है, लेकिन लेखन अब भी जारी है।
2014 में प्रकाशित हुआ गजल संग्रह
सुधीर परवाज द्वारा लिखी गई गजलों का संग्रह 2014 में आदमी ही तो हूं नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में उनकी करीब 65 गजलें शामिल हैं, जो परिस्थितियों से जूझते आम इंसान, किसान और व्यवस्था पर चोट करती हैं।
प्रमुख रचनाएं
जुबान हिंदी हो उर्दू हो या हो अंग्रेजी
बुरा सुलूक गलत है किसी जुबान के साथ ।
कभी गिराती है दीवार को कभी छत को
मजाक करती है बारिश मेरे मकान के साथ ।
किसान देश का फिर खुदकुशी करेगा ही
न्याय होगा नहीं जब यहां किसान के साथ।
साकी शराब रहने दो मुझ को तो आब दे
डरता हो जो भी गम से तू उसको शराब दे।
होटल के काम बच्चे से तू अपने मत करा
स्कूल भेज हाथ में उसके किताब दे।
मैं तुम्हें अपना बना सकता नहीं मजबूर हूं
दरहकीकत मैं किसी की मांग का सिंदूर हूं ।
हां, मैं दानिश्वर नहीं हूं मैं तो इक मजदूर हूं
तुम मगर ये मत समझना इल्मो फन से दूर हूं।