सहारनपुर में सियासी दंगल का बिगुल बजते ही सहारनपुर में राजनीतिक सरगर्मी तेजी से बढ़ गई है। राजनीतिक दलों के सामने जिले की सभी सात सीटों पर मतदाताओं का मिजाज और मूड भांपने की चुनौती होगी।
हालांकि सभी दल अपने परंपरागत मतदाताओं को रिझाने के साथ जातीय समीकरण साधकर जीत की राह तलाशने में जुटे हैं। मगर, सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।
हालांकि सहारनपुर में पिछले कई चुनाव ध्रुवीकरण की भेंट चढ़ चुका है। यही कारण है कि चुुनाव के दौरान विकास और समस्याओं के मुद्दे पीछे छूट जाते रहे हैं।
तीन राज्यों की सीमा पर बसे सहारनपुर में विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। सातों सीट पर सपा और बसपा ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है।
भाजपा और कांग्रेस ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। ऐसे में चारों प्रत्याशी मैदान में आने के बाद चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ होगी। राजनीतिक दलों के प्रत्याशी अपने मतदाताओं के मिजाज भांपने में जुटने लगे हैं।
जातीय समीकरण साधने के लिए ही सभी राजनीतिक दलों ने अलग-अलग जातियों के प्रत्याशियों पर दांव खेला है। कुल मिलाकर मुस्लिम और दलित मतदाताओं के अलावा गुर्जर, सैनी, राजपूत बहुल क्षेत्र होने के कारण इनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि सभी सियासी दलों ने इन जातियों के प्रत्याशी या तो उतार दिए हैं या उनकी तलाश में जुटी है। केन्द्र की सत्ताधारी भाजपा जिले में अगड़ी जातियों के अलावा पिछड़ी और अति दलित के भरोसे इस बार मैदान में है।
सैनी, गुर्जर, राजपूत मतों को रिझाने के लिए बसपा विधायक महावीर राणा और धर्म सिंह सैनी को अपने पाले में कर लिया है। इसके अलावा कांग्रेस विधायक प्रदीप चौधरी ने भी भाजपा का दामन थामा है।
बसपा ने देवबंद और बेहट में मुस्लिम, देहात और रामपुर में दलित, गंगोह और नकुड़ में गुर्जर और शहर में ब्राह्मण प्रत्याशी के जरिये सोशल इंजीनियरिंग का पूरा जाल बिछाया है।
सपा ने देवबंद से राजपूत, बेहट, नकुड़ और देहात से मुस्लिम, गंगोह से गुर्जर, रामपुर मनिहारान से दलित और शहर सीट से वैश्य प्रत्याशी उतार कर इन सभी जातियों को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।
ऐसे ही कांग्रेस इमरान मसूद के जरिए मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करना चाहती है। इसके अलावा गुर्जर, सैनी और राजपूत पर दांव खेलकर इनको साधना चाहती है।