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कवि सम्मेलनों और मुशायरों पर लगा ब्रेक, लेखन भी प्रभावित

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- गीतकार विनोद भृंग - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। कोरोना महामारी से साहित्य क्षेत्र खासकर कवि सम्मेलनों और मुशायरों पर भी खास प्रभाव पड़ा है। सहारनपुर ने देेश ही नहीं, दुनिया को नामचीन शायर और कवि दिए हैं। आलम यह है कि दुनिया भर के मंचों पर वाहवाही लूटने वाले जनपद के यह शायरों और कवियों की जिंदगी जैसे ठहर सी गई है। उन्हें बीते करीब 11 माह से कोई बड़ा मंच नहीं मिला है। हालांकि वर्चुअल काव्य गोष्ठियां जरूर हुई हैं, लेकिन रचनाकर वर्चुअल गोष्ठियों को केवल संवाद का जरिया मानते हैं। शायरों और कवियों का कहना है कि अगर क्रिया और प्रतिक्रिया न हो, सामने श्रोताओं की भीड़ और तालियों की गड़गड़ाहट ना हो तो कविता या शेर पढ़ना केवल औपचारिकता भर रह जाता है। पेश है ऐसे ही कुछ चुनिंदा शायरों और कवियों के अनुभवों पर आधारित रिपोर्ट...
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प्रख्यात शायर डॉ. नवाज देवबंदी कहते हैं कि अपनी रचनाओं को सुनाने के लिए माहौल चाहिए होता है, जो कोरोना के चलते बीते करीब एक साल से खत्म हो चुका है। पहले वह महीने में 20 से 25 मुशायरे और कवि सम्मेलनों में प्रतिभाग करते थे, मगर कोरोना के चलते 11 माह बाद 18 मार्च को दुबई में पहला मंच मिला है। मगर अच्छी बात यह हुई है कि जहां हम बीते कई वर्षों से मुशायरों और कवि सम्मेलनों के लिए दौड़ रहे थे कोरोना काल में घर पर सुकून से रहने का मौका मिला है। वह वर्चुअल गोष्ठियों को औपचारिकता मात्र मानते हैं। उनका कहना है कि कवियों और शायरों को मंच पर अपनी रचना पढ़ते हुए प्रतिक्रिया चाहिए होती है जो उनमें जोश भरती है।
कवि राजेंद्र राजन का कहना है कि कोरोना ने साहित्य मंचों खासकर कवि सम्मेलनों और मुशायरों को पूरी तरह प्रभावित किया है। एक तरह से सब कुछ ठहर गया है। चूंकि कवि सम्मेलन कॉलेजों, मेलों, सांस्कृतिक आयोजनों में होते थे, मगर कोरोना ने कॉलेजों, मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर भी ब्रेक लगाया, जिसकी वजह से कवि सम्मेलन भी नहीं हो सके। खाली पड़े कोई नई रचना लिखते, मगर उसके लिए मूड चाहिए, जो कोरोना काल में बन नहीं सका है। मंचों के जरिए भाषाओं का प्रसार होता है, जो कोरोना के चलते रुका है। हालांकिं कोरोना ने जिंदगी जीने की नई सोच पैैदा जरूर की है।
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साहित्यकार विजेंद्रपाल शर्मा का कहना है कि कोरोना ने जन और जीवन के साथ हर गतिविधि को प्रभावित किया है। साहित्य लेखन के लिए अच्छा माहौल और मूड चाहिए, लेकिन कोरोना ने दुनिया को ऐसा उलझाया कि साहित्यकार लेखन कार्य को भी पूरी तरह से नहीं कर सके खासकर पूर्ण लॉकडाउन के दौरान।
गीतकार विनोद भृंग का कहना है कि बीते कई दशक से उनकी लेखनी निरंतर चल रही है। गीत और साहित्य लेखन एक साधना है, जो कोरोना के चलते बेहद प्रभावित हुई है। लॉकडाउन के दौरान घर पर खाली रहकर नई रचनाएं लिखने के प्रयास किए गए हैं। वर्चुअल गोष्ठियों के जरिए संवाद कायम करने के साथ ही नई रचनाओं को सुनने और सुनाने की परंपरा को जिंदा रखने का प्रयास किया गया है।

- मशहूर शायर नवाज देवबंदी- फोटो : SAHARANPUR

- गीतकार राजेंद्र राजन- फोटो : SAHARANPUR

- साहित्यकार विजेंद्रपाल शर्मा- फोटो : SAHARANPUR

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