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छलका दर्द ः पहाड़ सा कटता है अब तो गांव में दिन

Fri, 26 May 2017 12:34 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
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शब्बीरपुर में मौजूद पुलिस और ग्रामीण। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर में चिलचिलाती धूप से बड़गांव का पानी जितना खौल रहा है उससे कहीं ज्यादा उबाल हिंसा प्रभावित गांवों में है। हर तरफ आपसी वैमनस्यता का जहर फैला है।
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समझते देर नहीं लगती कि यह सब धर्म, राजनीति और समाज के ठेकेदारों ने कराया है। बहरहाल पूरे बड़गांव इलाके ने सिर से पैर तक सन्नाटा ओढ़ लिया है। बस्ती दलितों की हो या राजपूतों की दोनों जगह खामोशियों ने घेरा बना लिया है। आंगन, सहन चौबारे यहां तक की बाग बगीचों में विरानी छाई है।

गांवों की पगडंडियों पर पुलिस का पहरा है। दरवाजे ही नहीं लोगों की जुबान पर भी जैसे ताला लगा हुआ है। आलम यह है कि इक्का दुक्का दुकानें जरूर खुली हैं बाकी बाजार बेजार है। उधर, शब्बीरपुर का एक स्याह सच भी अब धीरे-धीरे सामने आता दिखाई दे रहा है।
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यहां भी पलायन की पटकथा लिखी जा रही है और उसकी शुरुआत नन्हे-मुन्ने बच्चों की ओर से कर दी गई हैं। करीब चार दर्जन प्राइमरी के बच्चों को परिजनों ने रिश्तेदारों के यहां शिफ्ट कर दिया है। 

 बीमारी से परेशान मांगेराम कहते हैं कि इन आंखों ने घर जलते देखा है। गैरत की जिंदगी से अच्छा है कि कहीं और चला जाए। लोगों का दावा है कि कई ऐसे लोग हैं जो बाहर कमाने गए रिश्तेदारों से भी संपर्क कर रहे हैं।

बृहस्पतिवार को अमर उजाला की टीम ने शब्बीरपुर के अलावा सिसौनी, शिमलाना, अंबेहटा चांद और दल्हेड़ी का दौरा किया तो हर कोई इस जातीय हिंसा में खुद को अपमानित और खून का घूंट पीने जैसा महसूस करता दिखाई दिया।

दोपहर की कड़ी धूप में भी गांव में लोग देहरियों पर उम्मीद की टकटकी लगाए बैठे हैं। आंखों में आंसू लिए दल सिंह कहते हैं कि बच्चों की पढ़ाई तक छूट गई है और गांव में दिन काटना भी पहाड़ सा लगता है। एक झटके में गांव के भाई चारे को नजर लग गई।

अब इस बुढ़ापे में यही दिन देखना रह गया था। किरणपाल सिंह राजपूत कहते हैं कि जो भी हो रहा है वह ठीक नहीं है। गांव में भाईचारे की मिसालें दी जाती थीं। मगर, गांव में ऐसी आग लगी है जिसकी लपटें बहुत दूर तक जा रही हैं।

सिसौनी गांव की एक बुजुर्ग महिला पहले तो बात करने को तैयार नहीं हुई, मगर बाद में बोली, नए लड़कों के दिमाग की खुराफात की वजह से अमन चैन नहीं रह गया है। बात-बात पर झगड़े पर उतारू लड़के अब बस में भी नहीं हैं।

हमारे जमाने में तो कभी ऐसी मार-काट नहीं देखी। अंबेहटा चांद और दल्हेड़ी में भी कोई इस मुद्दे पर खुलकर बोलने तो राजी नहीं है। झुंड में बैठे लोगों का कहना है कि जो हो रहा है वह सबकी आंखों के सामने हैं।

शासन-प्रशासन को जो करना है कर रहा है और हमको जो करना होगा हम करेंगे। दोपहर करीब 11 बजे शब्बीरपुर में धूल उड़ाती गाड़ियों का काफिला पहुंचा तो पसरा सन्नाटा टूटा।

प्रमुख सचिव गृह की अगुवाई में पहुंचा अमला घर जाकर लोगों से बातचीत की। हालांकि प्रशासनिक अमले की कवायद भी लोगों के दिलों की नफरत दूर करने में सकारात्मक भूमिका अदा कर रही है।
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