देवबंद/तीतरों। किसी जमाने में देवबंद के पैबंदी बेर और तीतरों के फुलम की अलग पहचान थी। इन फलों की महक से ही लोग इनकी तरफ आकर्षित हो जाते थे। देश के कई राज्यों में इनकी मांग थी, लेकिन मौजूदा समय में यह विलुप्त होने की कगार पर है।
पुराने बाग कट गए, नए के प्रति नहीं दिखा रहे रुचि
देवबंद के कुलदीप छाबड़ा बताते हैं कि एक समय था जब देवबंद के मशहूर मीठे पैबंदी बेर की फसल आने के बाद नगर के बाजारों में आ जाओ लड्डू खा लो, पेड़े वाले बेर ले जाओ की आवाजें सुनने को मिलती थीं, लेकिन यह आवाज अब गुम हो गई।
शिक्षक सय्यद वजाहत शाह बताते हैं कि अठपेड़, मेहतरो वाली, जाकिर वाली, शीतलो वाली, साबिर वाली और दारुल उलूम की बेरी समेत सैकड़ों बेरी के बाग यहां थे। आबादी बढ़ने के साथ ही बेरी के बाग काॅलोनियों में तब्दील हो गए। हाल में इक्का दुक्का बाग ही यहां बचा है। यदि समय रहते उचित संरक्षण नहीं मिला तो देवबंद का मीठा पैबंदी बेर सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगा।
फुलम का नहीं मिलता उचित दाम, इसलिए हुआ मोहभंग
वहीं, तीतरों के बरसी गांव निवासी फुलम की खेती करने वाले किसान महावीर सिंह बताते हैं कि कच्ची गढ़ी मार्ग, सालियर रजबहे मार्ग, आसफगढ़ पापड़ी रजबहे आदि फुलम का क्षेत्र हुआ करता था। उनके गांव में ही करीब एक हजार बीघा जमीन पर फुलम के बाग थे, लेकिन बाजार में फुलम के उचित दाम नहीं मिलने के कारण किसानों का इससे मोहभंग हो गया।
किसान विकास चौधरी बताते हैं कि फुलम के पेड़ों की अत्यधिक देखरेख करनी पड़ती थी। दूसरा जलस्तर भी लगातार घटता चला गया। जिससे पेड़ सूखने लगे। इसे देखते हुए किसानों ने फुलम की खेती छोड़ना ही बेहतर समझा।
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पुराने बाग धीरे-धीरे खत्म होते चले गए। नए बाग किसी ने लगाए नहीं, जिस वजह से यह स्थिति है। किसानों को जागरूक किया जा रहा है कि कोई भी फसल विलुप्त न होने दें और अधिक से अधिक बाग लगाएं।
- गमपाल सिंह, जिला उद्यान अधिकारी