सहारनपुर में विधानसभा चुनाव के बाद अब राजनीतिक दल जीत और हार के मंथन में जुटने लगे है। जिन सीटों पर पार्टियों को हार का सामना करना पड़ा है, वहां अब हुई गलतियों को समीक्षा शुरू हो गई है।
बसपा का बेहद मजबूत गढ़ माने जाने वाले सहारनपुर में करारी हार के बाद पार्टी के नेता कमियों के आंकलन में लगे हैं। वहीं, हारी हुई सीटों पर भाजपा, सपा और कांग्रेस के नेता भी मंथन कर रहे हैं।
सहारनपुर की सात सीटों में चार पर भाजपा, दो पर कांग्रेस और एक सपा के खाते में आई है। जबकि बसपा यहां खाता भी नहीं खोल पाई है। इससे पहले वर्ष 2012 के चुनाव में बसपा को चार सीटों पर सफलता मिली थी।
एक-एक सीट भाजपा, कांग्रेस और सपा पास गई थी। उस चुनाव में काजी रशीद मसूद सपा छोड़कर कांग्रेस में गए थे और कांग्रेस ने बेहद मजबूती से हर सीट पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी।
इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन के चलते यह माना जा रहा था कि मुस्लिम मत एकजुट होकर गठबंधन के साथ रहेगा। जबकि बसपा दलित-मुस्लिम गठजोड़ के साथ अपने सोशल इंजीनियरिंग के भरोसे मैदान में डटी थी।
उधर, भाजपा मोदी लहर के भरोसे हिंदू मतों को एकजुट होने की उम्मीद में थी। बेहट सीट पर कांग्रेस की जीत के पीछे साफतौर पर यह बात सामने है कि यहां मुस्लिम मतों के साथ ही हिंदू मतों में जबरदस्त सेंधमारी हुई।
जबकि बसपा पूरी तरह से दलित-मुस्लिम फार्मूले पर सफल नहीं हो पाई है। भाजपा भी यहां हिंदू मतों को एकजुट कर पाने में नाकाम रही। नकुड़ में कांग्रेस मुस्लिम मतों को एकत्र कर पाई, मगर यहां उसे हिंदू मत उम्मीद के मुताबिक नहीं मिले।
जबकि मुस्लिम मतों में हुई सेंधमारी भी नहीं रुक पाई। इससे उलट भाजपा ने हिंदू मतों को एकजुट कर दलित मतों में जबरदस्त सेंध लगाई। बसपा दलित-गुर्जर फार्मूले पर सफल नहीं हुई।
गंगोह में सपा-कांग्रेस के बीच अंतर्कलह के चलते इनके मत बिखरे रहे। भाजपा पूरी तरह हिंदू कार्ड पर सफल रही। यही कारण देवबंद और रामपुर में भी भाजपा को जीत दिलाने में कामयाब रहे।
जबकि बसपा अपने बेस वोट दलित को भी रोक पाने में नाकाम रही। इसके अलावा अन्य जातियों को रिझाने में उसके प्रत्याशी सफल नहीं रहे। गठबंधन के प्रत्याशी जिन जगहों पर हिंदू और मुस्लिम मत पाने में सफल रहे वहां सीट उनके खाते में आई। अब सियासी दल पूर्वानुमान और चुनाव के परिणामों की समीक्षा में जुटे हैं।