सहारनपुर। वन्य जीव वैज्ञानिक और पर्यावरण विदों की राय पर यदि केन्द्र और राज्य सरकार संज्ञान ले तो उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व, सहारनपुर की शिवालिक पर्वतमाला, हरियाणा के कलेसर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी और हिमाचल के सिंबलवाड़ा सेंचुरी तक वन्य जीवों का न केवल स्वच्छंद विचरण हो सकेगा, बल्कि अवैध खनन पर पूरी तरह से रोक लग सकेगा। इस बाबत वैज्ञानिकों और वन्य जीवों के जानकारों की टीम ने कुछ साल पहले अध्ययन भी किया था। जिस पर फाइलों में विचार तो हो रहा, लेकिन वह गतिशील नहीं है।
वन और वन्य जीवों के लिए काम करने वाली देश की सबसे बड़ी संस्था वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया देहरादून की ओर से तत्कालीन डीन और वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. एजीटी जॉन सिंह, डब्ल्यूआईआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विभाष पांडव और आई ऑफ द टाइगर के चीफ फंक्शनरी और वन्य जीव विशेषज्ञ राजीव मेहता 2004 में उत्तराखंड के राजाजी के मोहंड से प्रवेश करते हुए हाथियों और बाघों के विचरण को लेकर चार राज्यों तक अध्ययन करने के लिए निकले थे। अध्ययन के दौरान हाथी और बाघ का पगमार्क और डंग यमुनानगर के कलेसर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में मिला था। सहारनपुर के शिवालिक के मोहंड क्षेत्र से भी इन्होंने जानकारी जुटाई, लेकिन खनन की वजह से वन्य जीवों का विचरण यहां पर काफी प्रभावित मिला। अध्ययन के बाद डब्ल्यूआईआई में वैज्ञानिकों और जानकारों ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट पेश की, जिसमें ये जिक्र किया गया कि राजाजी टाइगर रिजर्व से लगते उत्तरप्रदेश के सहारनपुर के शिवालिक क्षेत्र को बफर जोन के रूप में विकसित किया जाए तो उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और हिमाचल तक वन्य जीवों का मूवमेंट हो सकता है।
सहारनपुर परिक्षेत्र के वन संरक्षक वीके जैन का कहना है कि सहारनपुर के शिवालिक वन क्षेत्र में गुर्जरों की मौजूदगी है। इन्हें पुनर्वासित करने की योजना सरकार की होती है। चूंकि पुनर्वासित करने को लेकर अधिक जमीन की जरूरत सहित अन्य सुविधाएं देनी पड़ती है, इसलिए इस ओर अभी विचार किया जा रहा है। ये केन्द्र और राज्य सरकार स्तर से होता है। वन्य जीवों का मूवमेंट अवैध खनन से निश्चित तौर पर प्रभावित होता है। वनों में भोजन की आवश्कता की पूर्ति नहीं होने पर वे कई बार बाहर की ओर भी आते हैं। हालांकि शिवालिक के कुछ रेंजों में भोजन और पानी की पर्याप्त व्यवस्था है। ये बात भी सही है कि मानवीय दखल कम होने से वन्य जीवों का मूवमेंट काफी रहता है।
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आई ऑफ द टाइगर चीफ फंक्शनरी और वन्य जीव विशेषज्ञ राजीव मेहता बताते हैं कि अवैध खनन रोकने और वन्य जीवों के मूवमेंट को शिवालिक में और प्रभावी बनाने को ग्रेटर राजाजी स्कैपलैंड विकसित करने की जरूरत है। इसके लिए सहारनपुर क्षेत्र के शिवालिक क्षेत्र को बफर जोन घोषित करना होगा। इसके लिए वन गुर्जरों के पुनर्वास सहित अन्य अतिक्रमण को हटाना होगा। ये जितनी जल्दी सरकारें कर सकें, उतनी जल्दी वन्य जीवों का मूवमेंट उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और हिमाचल तक संभव है क्योंकि ये जंगल एक दूसरे से जुड़ते हैं, लेकिन सहारनपुर के शिवालिक का बफर जोन नहीं होने से वन्य जीवों का स्वच्छंद विचरण इन राज्यों तक नहीं हो पा रहा है।
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वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ विभाष पांडव ने बताया कि जिस तरह से कार्बेट टाइगर रिजर्व से राजाजी टाइगर रिजर्व के बीच लैंसडाउन वन प्रभाग दोनों को जोड़ने का काम करता है। ठीक उसी तरह से राजाजी टाइगर रिजर्व और हरियाणा के कलेसर, हिमाचल के सिंबलवाडा को वन्य जीवों के मूवमेंट को कनेक्ट करने के लिए सहारनपुर के शिवालिक पवर्तमाला को बफर जोन बनाने की बहुत जरूरत है क्योंकि एक बाघ करीब 1500 स्क्वायर किलोमीटर की दूरी तय कर सकता है और ये चारों राज्यों को किसी तरह से वन के माध्यम से बफर जोन बनाते हुए जोड़ दिया जाए तो भविष्य में वन्य जीवों और बेहतरीन पर्यावरण और वनों की बड़ी संभावना है। अवैध खनन जैसी विभीषिका से भी जंगल, जमीन, नदियों को बचाया जा सकता है।