एक ओर जहां राज्य सरकार दसवीं पास कर चुके छात्रों को मुफ्त में स्मार्ट फोन देने की तैैयारी में है। वहीं शिक्षा क्षेत्र की एक हकीकत यह भी है कि सरकारी स्कूलों में अभी तक कक्षा एक से पांच तक की एक भी किताब नहीं पहुंची है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई का बेस कमजोर हो रहा है। सरकार की इस अनदेखी के कारण 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा के लिए बना शिक्षा का अधिकार कानून का भी मखौल उड़ाया जा रहा है।
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है। कानून के तहत ही सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले आठवीं तक के बच्चों को यूनिफॉर्म और किताबें सरकार द्वारा मुफ्त मुहैया कराई जाती हैं। पिछले वर्षों में मई और जून माह तक किताबें स्कूलों में पहुंच जाती थीं। मगर पिछले कुछ सालों से किताबें पहुंचने का समय गड़बड़ाया हुआ है।
इस बार सत्र शुरू हुए करीब साढ़े चार महीने का समय गुजर चुका है, मगर कक्षा एक से पांच तक की एक भी किताब जनपद में नहीं पहुंची है। कक्षा छह से आठ तक की भी 25 फीसदी किताबें ही मिली हैं। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई का बेस यानी नीव किस स्तर की होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सरकार को नहीं बच्चों की परवाह
बेसिक स्कूलों के प्रति सरकार की अनदेखी से अभिभावक नाराज हैं। गांव हसनपुर निवासी विक्रम सिंह, जोगेंद्र और अमित का कहना है कि पहले सरकारी स्कूलों के बच्चों को छात्रवृत्ति भी मिलती थी, जिसका गरीब बच्चों को काफी सहारा मिलता था। मगर सरकार ने पहले तो बच्चों की छात्रवृत्ति बंद कर दी और अब किताबें तक नहीं दी जा रही हैं।
उपलब्ध नहीं हो रही पुुरानी किताबें
विभागीय अफसरों की मानें तो सरकार ने बच्चों को पुरानी यानी पिछले वर्ष की किताबों से पढ़ाने के आदेश दिए हैं। उन्होंने शासन से मिले आदेशों को शिक्षकों तक पहुंचा दिया है। इसमें कहा गया है कि जो बच्चे पास कर अगली कक्षाओं में पहुंच गए हैं उनकी किताबें लेकर पिछली कक्षा के बच्चों को दे दी जाएं।
शिक्षकों की मानें तो यह संभव नहीं है। बताया कि सरकारी किताबें बिना जिल्द और कमजोर कागज की होती हैं। बच्चों को किताबें के रखरखाव की समझ नहीं होती। ऐसे में ज्यादातर बच्चों की किताबें कुछ ही महीने में फट जाती हैं। ऐसे में पुरानी किताबें उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। जिसकी वजह से पढ़ाई बंद है।