सहारनपुर, नानौता। ब्लॉक के गांव भाबसी रायपुर निवासी पंडित आशाराम ने आजादी की लड़ाई में जेल में बंद रहने के दौरान अपनी पत्नी और नवजात पुत्र तक को खो दिया, लेकिन अंग्रेज अफसरों की बर्बरता के सामने नहीं झुके। इसका उन्हें खामियाजा कभी कोड़ों की सजा तो कभी जेल की तन्हाई के रूप में मिला।
स्वतंत्रता सेनानी पंडित आशाराम का जन्म 1909 को पंडित छज्जू सिंह के यहां हुआ था। छज्जू सिंह उस समय वहां के पटवारी थे। पिता की मृत्यु के बाद पंडित आशाराम के बड़े भाई पंडित दयाराम को पटवारी बना दिया गया। ये अपने चार भाइयों में दूसरे नंबर पर थे। मात्र 16 साल की आयु में पंडित आशाराम आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। 21 वर्ष की आयु में उन्हें सहारनपुर जुबली पार्क में देश की आजादी की एक सभा में भारत मां की जय के नारे लगाने पर गिरफ्तार किया गया। उसके बाद 1932 में नानौता स्टेशन वह डाकघर को जलाने के संदेह में पकड़े गए। इसी दौरान अंग्रेज सरकार ने इनके पटवारी भाई को पद से बर्खास्त कर दिया। इससे परिवार आर्थिक तंगी से घिर गया। इसी दौरान इनकी पत्नी और नवजात शिशु की मौत हो गई।
यह दुखद समाचार जब जेल पहुंचा तो जेलर ने इनसे माफी नामा लिखकर देने पर छोड़ देने का प्रस्ताव रखा। पंडित आशाराम के सख्ती के साथ मना करने पर उन्हें कोड़ों की सजा देते हुए जेल की तन्हाई में डाल दिया गया। इस दौरान उसने कभी चक्की पिसवाना और कभी बाण बटवाना जैसे कार्य भी तंग करने के लिए कराए गए। जेल से छूटने के बाद इन्हें लंबे समय तक नजर बंद रखा गया। 1942 में पुन: गिरफ्तारी हुई और उस वक्त की सबसे कठोर कारागार बरेली में रखा गया। इससे पहले 1938 में उन्होंने दूसरी शादी की और जेल में रहने के दौरान 1942 में उन्हें पुत्र हुआ। यह खबर जब जेल में पहुंची तो साथी स्वतंत्रता सेनानियों ने उस वक्त उनके साथ जेल में बंद डॉ. राजेंद्र प्रसाद (बाद में भारत के प्रथम राष्ट्रपति) के नाम पर बेटे का नामकरण किया। आजादी के आंदोलन में अविस्मरणीय सहयोग के कारण पंडित आशाराम को तत्कालीन सरकार ने 1974 में ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया। स्वतंत्रता सेनानी पंडित आशाराम के दो बेटे राजेन्द्र प्रसाद और राजकुमार शर्मा हुए। इनमें राजेंद्र प्रसाद का निधन हो चुका है।
नानौता में लगा स्वतंत्रता सेनानियों का शिलापट- फोटो : SAHARANPUR
पंडित आशाराम को मिला ताम्र पत्र- फोटो : SAHARANPUR