फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

तीन तलाक में सियासतदां हस्तक्षेप न करें: उलमा

Sun, 03 Dec 2017 01:22 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, देवबंद
विज्ञापन
आतिया साबरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन
एक बार में तीन तलाक देने पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार के कानून बनाने की दिशा में उठाए गए कदम का देवबंदी उलमा ने विरोध किया है। उनका कहना है कि तीन तलाक मुसलमानों का मजहबी मामला है। संसद के अंदर तीन तलाक के खिलाफ बिल पास करना सरासर जुल्म और ज्यादती है।
विज्ञापन


शनिवार को मदरसा हकीमुल इस्लाम के मोहतमिम मौलाना कारी रहीमुद्दीन कासमी ने कहा कि तीन तलाक शरीयत-ए-इस्लाम का मसला है। चाहे वो तीन तलाक हो या फिर निकाह, सब मुसलमानों के मसाइल हैं। 

इसमें सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जब इस मुल्क में हमें मजहबी तौर पर रहने की आजादी मिली है, जिसके तहत सभी लोग अपने अपने धर्म के मुताबिक जिंदगी जी सकते हैं। इसलिए सियासतदानों को इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इस मामले में सरकार को मजहबी लोगों से राय मशविरा करना चाहिए। 
विज्ञापन


मुफ्ती मोहम्मद शौकत का कहना है कि शरीयती कानून अल्लाह की ओर से बनाए हुए कानून हैं। कुरआन-ए-करीम और हदीस दोनों को मिलाकर मजहबी इस्लाम मुकम्मल होता है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक पर कानून पास करना ये हुकूमत और सियासतदानों का काम नहीं है ये मजहबी मसला है और उसे मजहबी रहनुमाओं के हवाले कर देना चाहिए। 

उधर, इस मामले में मदरसा दारुल उलूम निसवा के मोहतमिम मौलाना लतीफ का कहना है कि एक साथ तीन तलाक इस्लाम में भी नापसंदीदा अमल है। उनका कहना है कि कानून बनाने से तीन तलाक देने के मामलों में कमी  जरूर आएगी। 

तीन तलाक पर पांच साल की अनिवार्य सजा होनी चाहिए : आतिया साबरी
सहारनपुर। तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में वाद दायर करने वाली सहारनपुर की आतिया साबरी ने सरकार द्वारा एक बार में तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने को सही ठहराया है, लेकिन सजा और अधिक होनी चाहिए थी।

किसी विवाहिता की जिंदगी उजाड़ देने वाले व्यक्ति को कम से कम पांच साल की अनिवार्य सजा दी जानी चाहिए। सहारनपुर के मंडी कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला आली की चुंगी पर रहने वाली आतिया साबरी का कहना है कि सजा कम से कम पांच साल की दी जानी चाहिए थी जिसे अनिवार्य किया जाए। जिसमें चार्जशीट देने और जांच की प्रक्रिया बाद में शुरू होती। पहली बार में ही गिरफ्तारी कर जेल भेजा जाए। 

पांच साल से पहले जमानत नहीं हो। पांच साल के बाद तीन तलाक देने वाले पर मुकदमा चलाया जाए। इस कानून को सख्त बनाया जाए। जिससे तीन तलाक पर पूरी तरह से रोक लग सके। उन्होंने कहा कि तैयार किए गए मसौदे में संशोधन के लिए वह मंत्रालय को पत्र भेजेंगी। जिसमें अनिवार्य सजा और तुरंत गिरफ्तारी की मांग की जाएगी। 

सजा के कानून से   संतुष्ट नहीं 
दिशा सामाजिक संस्था से जुड़ीं रेहाना अदीब कहतीं हैं कि सरकार द्वारा तैयार किए गए सजा के कानून से वह संतुष्ट नहीं है।   इस सजा के प्रावधान से तीन तलाक का दंश झेलने वाली महिलाओं के लिए कोई रास्ता नहीं रह जाएगा। सरकार को पीड़ित महिला का परिवार बचाने के लिए कोई रास्ता बनाना चाहिए जिससे तीन तलाक न दिया जा सके और महिला की जिंदगी बर्बाद न हो। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें