सहारनपुर में किसी भी प्रकार से दलित किसी अन्य समाज से पीछे नहीं है। समाज के साथ दलित काफी आगे बढ़े हैं, सरकारी नौकरियों में होने के साथ ही शब्बीरपुर के दलित 60-60 बीघा भूमि के मालिक भी है।
इनके पास शिक्षा की ओर रुझान ने जागरूकता पैदा की है, अधिकारों को समझा और उनका प्रयोग किया है। न सिर्फ सामाजिक स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि राजनीतिक स्थिति भी सुदृढ़ है। राजनीतिक गतिविधियों में सक्रियता के साथ-साथ सभी राजनीतिक दलों द्वारा प्राथमिकता दिए जाने के कारण राजनीतिक स्तर बढ़ा है।
ग्राम शब्बीरपुर में ही इस बार अनारक्षित सीट होते हुए भी दलितों ने प्रधानी पर कब्जा कर लिया। जबकि लगभग तीन हजार की वोटिंग वाले गांव में दलितों के लगभग बराबर ही राजपूत हैं। यहां पर पिछली योजना में तो सीट आरक्षित रही थी, लेकिन इस बार सीट अनारक्षित थी।
सिर्फ शब्बीरपुर ही नहीं सहारनपुर के अधिकांश गांव ऐसे हैं जहां दलितों की स्थिति अन्य से कमतर नहीं है। चाहे गांव घड़कौली हो, शिमलाना हो, अंबेहटा चांद, सिसौनी, मजबता माजरा, मल्हीपुर हों। सभी में दलितों ने अपने को साबित किया है और अन्य जाति वर्ग के समकक्ष खड़ा कर दिया है।
ग्राम शब्बीरपुर में ही मौजूदा प्रधान शिव कुमार के पास साठ बीघा से भी अधिक जमीन है। अधिकांश दलितों के पास अपनी खेती की जमीन है। कई लोगों की सरकारी नौकरियां हैं, प्राईवेट नौकरियों में भी अच्छी कंपनियों में अच्छे पदों पर हैं।
शब्बीरपुर ही नहीं आसपास के गांवों एवं बड़गांव तथा सहारनपुर तक में दुकानें खोली हुईं हैं। सहारनपुर के अधिकांश गांवों के दलितों की आर्थिक स्थिति कमजोर नहीं हैं।
आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के कारण दलितों में आत्मविश्वास बढ़ा है और हर स्थिति का सामना करने के लिए मजबूत हुए हैं।