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जातीय हिंसा की आंच में झुलस गया भाईचारा

Sun, 07 May 2017 12:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
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शब्बीरपुर में संघर्ष के दौरान घरों में की गई आगजनी के बाद का मंजर। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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गांव शब्बीरपुर में हुए जातीय संघर्ष के दूसरे दिन भी घरों और बिटौड़ों से उठता धुआं उपद्रवियों की बर्बरता की कहानी बयां कर रहा है। घटना के दूसरे दिन भी कई जगहों पर आग सुलगती रही। जले हुए घर, टूटा बिखरा सामान और जलीं दीवारें नफरत की आग से मिले दर्द का एहसास करा रही है। खूंटे से बंधे मवेशी भी झुलस गए।
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शुक्रवार को हुए इस बवाल के चलते शनिवार को गांव में सन्नाटा पसर गया। गांव में सिर्फ पुलिस बल के अलावा कोई बच्चा तक नजर नहीं आया। लेकिन गांव के जले हुए घर और उनमें से दूसरे दिन भी उठता धुआं बवाल की कहानी बयां करते रहे। गांव में पुरुष तो घटना के बाद से ही नदारद हो चुके थे।

कुछ घायल होकर अस्पताल में थे तो कुछ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और कुछ पुलिस की कार्रवाई की डर से गांव से बाहर जाकर छिप गए। गांव में कुछ महिलाएं ही शेष थीं जो खुद ही बाल्टियों में पानी लाकर आग को बुझाने का प्रयास कर रहीं थीं।
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कई घरों में तो उपद्रवियों ने चूल्हे तक तोड़ डाले। घरों में रखे बर्तन, कपड़े सहित अन्य सामान जल गया। नफरत की आग में 50 से अधिक घर प्रभावित हुए हैं। सुरक्षा की दृष्टि से अधिकांश लोगों ने अपने घरों के बच्चे तक गांव से बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिए हैं।

आग से बेचैन कई मवेशी खेतों में चले गए। लेकिन खूंटे से बंधे मवेशी झुलस गए। एक घेर में गाय की बछिया खूंटे से बंधी झुलसती रही। उसे अपने मालिक का इंतजार है। उन्हें चारा डालने वाला भी कोई नजर नहीं आ रहा। डर से लोग अभी गांव में नहीं जा रहे हैं।

रोक दी गई घुड़चढ़ी
गांव शब्बीरपुर में राजपूत समाज के एक युवक की शादी होनी है। यहां मंढ़ा कार्यक्रम चल रहा था। लेकिन इस उपद्रव के चलते युवक की घुड़चढ़ी का कार्यक्रम रोक दिया गया है। परिवार के लोग बैंडबाजे की बजाय परिजनों को ही बारात के रूप में लेकर गए।
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