सहारनपुर। अपने सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे को पार्टी से बाहर करने से पहले बसपा ने मजबूत गढ़ सहारनपुर में पूरी किलेबंदी कर ली थी। पूर्व सांसद काजी रशीद मसूद और अब पूर्व सांसद मंसूर अली खान को पार्टी में शामिल कर नसीमुद्दीन को पार्टी से निकालने से पहले की तैयारी मानी जा रही है। बसपा में हाल ही में शामिल हुए दोनों मुस्लिम चेहरे मुसलमानों के साथ ही हिंदुओं में भी अपनी पैठ रखते हैं।
यही कारण है कि काजी रशीद मसूद और मंसूर अली खान जैसे मुस्लिम चेहरों से जमीन मजबूत करने के बाद सहारनपुर में नसीमुद्दीन के खास लोगों को पार्टी के बाहर का रास्ता दिखाया गया है। सहारनपुर में भी नसीमुद्दीन समर्थक लियाकत अली, अहसान कुरैशी, मजाहिर राणा और आलम राणा को निष्कासित किया गया है।
सहारनपुर में सिद्दीकी के दो नेता बेहद खास माने जाते थे। शहर में अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन लियाकत अली और बेहट में विधानसभा चुनाव लड़ चुके अहसान कुुरैैशी। यही नेता स्थानीय स्तर पर बसपा के मुस्लिम चेहरों में भी शामिल रहे। वर्ष 2007 में शहर सीट से लियाकत अली और बेहट से अहसान कुरैशी प्रत्याशी रहे थे। प्रदेश में सरकार बसपा की बनी, मगर दोनों ही चुनाव हार गए थे। सत्ता में आने के बाद लियाकत अली को अल्पसंख्यक आयोग का चेयरमैन बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया गया था।
पिछले साल हुए पंचायत चुनाव में लियाकत ने अपने भांजे आलम राणा को जिला पंचायत का चुनाव लड़वाया और जीत भी दिलाई। हालांकि तमाम कोशिशों के बाद भी अध्यक्ष पद भांजे को नहीं दिलवा पाए।
इन सियासी हालात के बीच पूर्व सांसद काजी रशीद मसूद आठ बार सांसद और केन्द्र में मंत्री रहे हैं। काजी रशीद मसूद की पहचान सेक्यूलर नेता के रूप में रही है। पुराने बसपाई रहे पूर्व सांसद मंसूर अली खान की भी पार्टी में वापसी हुई है।