औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र में लगा 300 साल पुराना साइकस पेड़।
बालपन से लेकर युवा अवस्था और अब उम्र के आखिरी पड़ाव पर हूं। लगभग 300 साल पहले यहां पर मेरा जन्म हुआ था। अंग्रेजी शासनकाल बदल गया और साल दर साल कैलेंडर भी बदल रहे हैं। करीब तीन सदी के इस दौर में यूं तो मुझे सभी ने बेहद प्रेम भाव से रखा, लेकिन मैं शुक्रगुजार हूं उन सरकारी नुमाइंदों का जो उम्र के आखिर पड़ाव में परिवार के बुजुर्ग की तरह मेरी देखभाल कर रहे हैं।
एक इंसान की तरह मेरे लिए बेटे का कंधा न सही, लेकिन मेरी देखरेख करने वाले यह नुमाइंदे किसी बेटे से कम नहीं हैं। मैं उनसे दूर न जाऊं इसलिए ईंटों का कंधा देकर मुझे सहेज रहे हैं। अब तो इतना बूढ़ा हो चुका हूं कि पहले शाखाओं को सहेजने के लिए तीन पिलर बनाए गए थे। अब धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़कर छह हो गई। जितने दिन भी रहूं बस यह प्यार मिलता रहे। यह आत्मकथा है औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र में लगे 300 साल पुराने साइकस के पेड़ की है, जो इतना पुराना हो चुका है कि वह उम्र के आखिर दौर में है, लेकिन यहां पर तैनात अधिकारी और कर्मचारी हर पल इसका ध्यान रखते हैं। पेड़ की एक शाखा भी झुक जाए तो अधिकारी तुरंत मौका मुआयना करते हैं।