सहारनपुर में भी भगवा आंधी के बीच 24 साल बाद जबरदस्त वापसी करते हुए चार सीटों पर कब्जा जमाया। दलित-मुस्लिम गठजोड़ का समीकरण बैठाने में जुटी बसपा अपने गढ़ में खाता भी नहीं खोल पाई।
मतों के ध्रुवीकरण के चलते भाजपा देवबंद में बड़ी जीत हासिल कर 21 साल बाद इस सीट को अपने खाते में लाने में कामयाब हुई। पिछले चुनाव के मुकाबले भाजपा ने चार गुना बढ़त हासिल की तो वहीं कांग्रेस ने दो सीटों पर कब्जा जमाकर अपनी एक सीट का इजाफा किया।
सपा अपने पिछले प्रदर्शन पर ही कायम रही। मुस्लिम शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र होने के चलते दुनिया भर के मुसलमानों की निगाहे सहारनपुर के परिणाम पर टिकी थी।
उधर, केन्द्र सरकार के दो साल पूरे होने पर पीएम मोदी ने सहारनपुर में विकास पर्व रैली और चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने यहां से परिवर्तन रैली की शुरुआत कर पार्टी के लिए सहारनपुर की महत्ता को जता दिया था।
ऐसे में यहां के विधानसभा चुनाव के परिणामों पर पूरे देश के लोगों के रुझान से इनकार नहीं किया जा सकता। भाजपा ने इस्लामिक तालिम के केन्द्र देवबंद में 21 साल बाद फतह हासिल कर लोगों को चौंका दिया।
जबकि यहां लगातार पिछले चुनावों में बसपा, सपा और कांग्रेस ने जीत दर्ज करने में कामयाब रहीं थी। देवबंद के अलावा नकुड़, गंगोह और रामपुर मनिहारान में भाजपा को जीत मिली है।
सहारनपुर किसी दौर में बसपा का गढ़ रहा था और यही कारण रहा है कि बसपा सुप्रीमो मायावती भी दो बार यहां से चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंची थी।
इसके अलावा बसपा के संस्थापक कांशीराम भी लोकसभा का चुनाव यहां से लड़ चुके हैं। मगर, इस बार बसपा सुप्रीमो के मोदी को रोकने के लिए मुस्लिमों को साथ आने की अपील भी बेेकार साबित हो गई।
वर्ष 2012 के चुनाव में भाजपा केवल शहर सीट पर जीत दर्ज कर पाने में कायमाब हुई थी। इसके अलावा बाकी छह सीटों पर भाजपा चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गई थी। जबकि इस चुनाव में बसपा ने चार सीटों पर जीत दर्ज की थी।
इसके अलावा यहां एक सीट पर कांग्रेस और एक पर ही सपा को विजय मिली थी। देवबंद का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि यहां से सपा के विधायक राजेन्द्र सिंह राणा को पार्टी ने हाथो-हाथ लिया था और सरकार गठन के बाद उन्हें मंत्री पद से नवाजा गया था। इससे पहले वर्ष 2007 में बसपा यहां पांच सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही थी।