सरसावा (सहारनपुर)। बाबा बंशी वाले वास्तव में ही सच्चे संत थे जो अन्नदानी के नाम से भी जाने जाते थे। जब भी किसी राज्य के किसी स्थान पर भागवत कथा कराने जाते तो अपने साथ भंडारे के आयोजन का परा साजो सामान लेकर चलते थे। मां अन्नपूर्णा की विशेष कृपा से अनवरत भंडारा चलता था। यही नहीं निर्बल और निर्धन लोगों को भी तीर्थ की यात्रा कराना उनका उद्देश्य था, जिसके लिए ट्रेन तक बुक करा दी जाती थी।
बाबा बंशी वाले के अनुयायी बताते हैं कि पूरे भारतवर्ष में बाबा बंशी वाले के आशीर्वाद से अनवरत भंडारे चलते रहते थे। क्योंकि पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड आदि अनेक राज्यों में बाबा के भक्तों ने आश्रम बनवाए और वहां भंडारों का आयोजन होता था। खास बात यह है कि न तो बाबा किसी को सामान लाने के लिए कहते थे और न ही कभी भंडारे में सामान कम रहा। बल्कि होता ये था कि यदि कहीं भंडारे की सूचना मिल जाती थी तो उनके अनुयायी ट्रकों के हिसाब से खाद्य सामग्री पहुंचाते थे जो भंडारे के हिसाब से भी बहुत अधिक मात्रा में होती थी।
इतना ही नहीं बाबा बंशी वाले के अनुयायियों ने पूरे भारतवर्ष के चारों धामों सहित समस्त तीर्थ स्थानों की यात्रा कर रखी थी। बाबा का कहना था कि जो निर्बल और निर्धन हैं उनको भी धर्म यात्रा का लाभ मिलना चाहिए। बाबा की यही बात उनके अनुयायियों को प्रेरित करती थी। बाबा की आज्ञा से अनुयायी पूरी ट्रेन तक बुक कर देते थे और सबको सूचना भेज दी जाती थी कि जिसको जाना है वह स्वयं अपना नाम दर्ज करा कर निशुल्क यात्रा कर सकता है।
फक्कड़ था बाबा का अंदाज
बाबा बंशी वाले का फक्कड़ अंदाज ही उन्हें असली संत की पहचान देता था। दरअसल बाबा बंशी वाले शरीर पर मात्र एक धोती तथा दुपट्टा डालकर रखते थे। सर्दी में भी बाबा के तन पर मात्र एक पतला सा कंबल और धोती रहती थी। बाबा ने कभी अपने लिए कुछ नहीं किया बल्कि जो आया सब भक्तों में वितरित कर दिया। वहीं भक्तों में भी होड़ लगी रहती थी कि बाबा आदेश करें और वह समाज के लिए कुछ कर पाएं।
गुरु पूर्णिमा पर लगता था मेला
बाबा बंशी वाले की प्रसिद्धि का आलम ये था कि गुरु पूर्णिमा के दिन ग्राम सोराना में मेले जैसी स्थिति होती थी। उनके अनुयायी लाखों की संख्या में आकर उनके चरणों में शीश नवाकर आशीर्वाद ग्रहण करते थे। वहीं श्रावण मास में कांवड़ यात्रा के दौरान सबसे बड़ा शिविर भी ग्राम सोराना में ही संचालित होता था। जहां उनके अनुयायियों द्वारा विशाल व्यवस्था के चलते सभी कांवड़िए विश्राम कर भोजन एवं धार्मिक अनुष्ठान करने के उपरांत ही गंतव्य की ओर रवाना होते थे।