सहारनपुर। पहली बार हो रहे निकाय चुनाव में दलित मतदाताओं के रुझान पर राजनीतिक दलों की नजर टिकी है। यही कारण है कि अपने वोट बैंक के साथ ही हर कोई दलितों को रिझाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। दलों ने हिंसा के बाद हो रहे चुनाव में दलित मतदाताओं को मोहरा बनाकर अपने जीत का सपना संजोया है। हालांकि इस चुनाव में दलितों की चुप्पी और भीम आर्मी की सक्रियता ने जरूर राजनीतिक दलों के माथे पर बल खीच रखा है।
दरअसल, सहारनपुर के नगर निगम सहित सभी निकायों में दलित मत निर्णायक भूमिका में होने के चलते उनके रुझान इस चुनाव में काफी मायने रखेंगे। यही कारण है कि दलितों को रिझाने के लिए प्रत्याशी पूरी ताकत झोकने में जुटे हैं। यहां तीन निकाय एससी के लिए आरक्षित होने के चलते राजनीतिक दलों ने दलित प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। ऐसे में अब वे इसकी कदम से दलितों को रिझाना चाहते हैं। इसके अलावा सहारनपुर हिंसा से पहले और बाद में अपनी पार्टी को दलित हितैषी बताने में जुटा है। यहां बता दें कि निकाय चुनाव में बसपा और सपा पहली बार अपने सिंबल पर चुनाव मैदान में उतरे हैं। उनके लिए यह चुनाव बेहद खास भी माना जा रहा है। कारण, बसपा का गढ़ रहे सहारनपुर में छह महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिली है। ऐसे में बसपा इस चुनाव के जरिए खुद को साबित करना चाहती है। यही कारण है कि उसने दलित मतों को एकजुट करने की कोशिश के साथ मुस्लिमों को भी अपने पाले में करना चाहती है। यही कारण है कि नगर निगम में हाजी फजलुर्रहमान सहित छह प्रत्याशी निकायों में उतारे हैं। कांग्रेस भी पूर्व विधायक इमरान मसूद के जरिए मुस्लिमों को और दलितों में सेंधमारी की पूरी कवायद हो रही है। भाजपा पहले ही हिन्दू मतों को एकजुट करने की जुगत से दलितों के बीच सक्रिय है। ऐसे में दलित मतों का रुझान निकाय चुनाव को काफी हद तक प्रभावित करेगा।
नए गांवों में सर्वाधिक दलित मतदाता
नगर निगम सीमा में शामिल किए गए 32 गांवों में ज्यादातर दलित बहुल हैं। ऐसे में नगर निगम चुनाव में दलित मतों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि यह पहली बार निकाय के लिए मतदान करेंगे तो उनका मूड भांपना काफी कठिन हो रहा है। फिलहाल दलितों को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे हैं।