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मुसलमानों के धार्मिक मसलों में अदालत या सरकारों को हस्तक्षेप का हक नहीं: उलमा

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देवबंद (सहारनपुर)। बहुविवाह और हलाला को लेकर छिड़ी बहस के बीच देवबंदी उलमा का कहना है कि निकाह, हलाला और बहुविवाह शरीयत के अहम हिस्से हैं और अदालतों को इसके साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।
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शुक्रवार को दारुल उलूम जकरिया के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती शरीफ खान ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बहुविवाह और हलाला को जिस तरीके से अदालत में पेश किया गया है उस तरीके से हलाला शरीयत में कतई नहीं है। बल्कि हलाला एक तरीके से तलाकशुदा औरत को सहारा देने का नाम है। उन्होंने कहा कि इस्लाम और कुरआन में बहुविवाह मान्य है, लेकिन इसके लिए भी कुछ शर्तें हैं। जिन्हें अदालत को जानना चाहिए। अगर इस देश में लिव इन रिलेशनशिप को वैध माना गया है तो बहुविवाह को वैध मानने में क्या समस्या है। मुफ्ती शरीफ ने कहा कि ट्रिपल तलाक, बहुविवाह और हलाला मुसलमानों का शरई मामला है। जिसमें हुकूमत को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। हिंदुस्तान के संविधान में भी हर धर्म के लोगों को अपने मजहबी तरीके से जीने का अधिकार दिया गया है। महजब-ए-इस्लाम ने चार शादियों का हुक्म नहीं बल्कि इजाजत दी है। मगर उसे एक से ज्यादा शादी करने पर बीवियों को बराबर का हक देना होगा। जहां तक हलाला का मसला है तो वो मर्द की गैरत को ललकारने के लिए है, न कि औरत पर जुल्म है। मुफ्ती शरीफ ने कहा कि शरीयती मामलों को लेकर वह ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ हैं।
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