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बढ़िया मुनाफे ने बढ़ाया मशरूम की खेती की ओर रूझान

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सहारनपुर। परंपरागत खेती में कम मुनाफे ने किसानों का रुख कृषि विविधिकरण की ओर कर दिया है। इसके चलते जिले के किसानों का रुझान तेजी से मशरूम की खेती की ओर हो रहा है। वर्ष 2008-09 में जहां जनपद में 20 से 30 क्विंटल मशरूम का उत्पादन होता था वह अब बढ़कर करीब 4000 क्विंटल प्रतिवर्ष तक पहुंच गया है।
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जिले में वर्ष भर मशरूम की खेती होती है। इसमें बटन मशरूम, ढिंगरी और मिल्की मशरूम शामिल हैं। इनमें मिल्की मशरूम की खेती जून से सितंबर तक होती है। सफेद बटन मशरूम की खेती अक्तूबर से फरवरी तक और ढिगरी मशरूम की खेती मार्च से मई तक होती है। अच्छे उत्पादन के चलते जनपद के किसानों का रुझान मशरूम की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। मशरूम के उत्पादन के बाद बचे हुए कंपोस्ट को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है जो भूमि में कार्बनिक पदार्थों को बढ़ाते हैं।
मशरूम विशेषज्ञ और कृषि विज्ञान केंद्र के सह निदेशक फसल सुरक्षा डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया कि 100 कंपोस्ट में मिल्की मशरूम का औसत उत्पादन 50 क्विंटल, सफेद बटन का 30 क्विंटल और ढिंगरी मशरूम का उत्पादन 60 क्विंटल तक हो जाता है। इसका औसत भाव 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक किसान को मिल जाता है। यहां से देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ आदि शहरों में मशरूम की सप्लाई होती है। इसलिए इस खेती में जहां कम स्थान की आवश्यकता होती है वहीं मुनाफा भी बढ़िया रहता है। उन्होंने बताया कि जिले में 200 से अधिक किसान मशरूम की खेती कर रहे हैं।
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मशरूम की खेती के फायदे
प्रोटीन एवं पोषक तत्वों से भरपूर
कमरों या झोपड़ी में उत्पादन,
छोटे एवं भूमिहीन किसानों के वरदान
स्व रोजगार का अच्छा साधन
कम लागत में बढ़िया मुनाफा
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