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अल्पसंख्यक की ढाल से नहीं मिल रहा आरटीई का लाभ

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अल्पसंख्यक के दर्जे से नहीं मिल रहा आरटीई का लाभ
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सहारनपुर। छह से चौदह वर्ष के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का अधिकार सहारनपुर में लागू होता नहीं दिख रहा है। कारण, ज्यादातर स्कूल खुद को अल्पसंख्यक का दर्जा लेकर इस नियम से बाहर हो चुके हैं। आलम यह है कि शिक्षा के अधिकार के तहत जिन स्कूलों को विभाग ने गरीब बच्चों के लिए आवंटित किया था, वह भी आनाकानी कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि शहर के कई नामचीन स्कूलों ने कागजी खेल कर अल्पसंख्यक का दर्जा ले रखा है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने आरटीई कानून को अल्पसंख्यक स्कूलों में लागू करना संविधान का उल्लंघन माना है। हालांकि बाकी सभी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों में यह कानून लागू होगा। आरटीई कानून के बाद से ही शहर के ज्यादातर स्कूल अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त हो गए हैं। ऐसे में शहर के गरीब बच्चों की शिक्षा पर ग्रहण दिखाई दे रहा है। शहर में आठ से ज्यादा स्कूल अल्पसंख्यक की श्रेणी में आते हैं। इन स्कूलों में आरटीई लागू नहीं होती। कुछ नामचीन स्कूल ऐसे है, जो इसी का फायदा उठाकर अभिभावकों का शोषण कर रहे हैं। ऐसे स्कूलों ने फीस में 15 से 20 फीसदी तक वृद्धि करने के साथ किताब, यूनिफार्म और स्टेशनरी आदि की दुकानों भी चिह्नित कर दी है।
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आखिर अल्पसंख्यक का क्या है आधार
अल्पसंख्यक स्कूलों को लेकर अब शहर में एक बड़ी बहस शुरू हो चुकी है। शहर के ज्यादातर बड़े स्कूलों ने अल्पसंख्यक का दर्जा ले रखा है। इस दर्जे के बाद भले ही स्कूल के नियम कायदों में बदलाव हुआ। मगर, उनके अल्पसंख्यक के दर्जे पर आंच नहीं आई।
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फीस में कटौती करने का दावा
आशा मार्डन स्कूल के प्रधानाचार्य और प्रोग्रेसिव स्कूल फोरम के संयोजक सुरेंद्र चौहान का कहना है कि अल्पसंख्यक स्कूलों में आरटीई लागू नहीं होती। उसके बावजूद भी उनके स्कूल ने आर्थिक स्थिति से कमजोर विद्यार्थियों की फीस में 50 प्रतिशत से अधिक की कटौती की है। फोरम की आगामी बैठक में शेष स्कूलों से भी इस संदर्भ में जानकारी जुटाकर विचार-विमर्श करेंगे।
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