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कयादत की लड़ाई में फिर मोहरा बनने लगा मुस्लिम मतदाता

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कयादत की लड़ाई में फिर मोहरा बनने लगे हैं मतदाता
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शशांक मिश्र
सहारनपुर। यूपी विधानसभा चुनाव के ठीक बाद निकाय चुनाव में एक बार फिर अपनी जमीन नापने में जुटे राजनीतिक दल अब कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। कोई हिंदू मतों को एकजुट कर मुस्लिमों में बिखराव की रणनीति बना रहा है तो कोई मुस्लिमों को अपने पाले में कर हिंदू मतों की सेंधमारी की कोशिश में है। कुल मिलाकर चुनाव के दिन बढ़ने के साथ ही राजनीतिक दल मतदाताओं को ध्रुवीकरण की ओर बढ़ाने लगे हैं। फिलहाल राजनीतिक दलों और नेताओं ने मतों को साधे रखने के लिए इस चुनाव को निकाय से हटाकर अपने कयादत (नेतृत्व) से जोड़ने में जुट गए हैं। फिलहाल मतदाताओं की खामोशी जरूर उनकी चिंता बढ़ा रही है।
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दरअसल, निकाय चुनाव को राजनीतिक दल लोकसभा चुनाव 2019 के ट्रायल के रुप में देख रहे हैं। यही कारण है कि सियासी पार्टियां इस चुनाव में अपने पूरे दमखम से जुटी हुई हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के रुझान को उसी आधार पर रोके रखना और उस वक्त के माहौल वाले मतदाताओं को अपने साथ बांधे रखना इनके लिए बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि मतदाताओं केे अपने नेतृत्व, ताकत, और अन्य चीजों की दुहाई देकर भी रिझाने का सिलसिला शुरू हो गया है। यहां बता दें कि सहारनपुर में पहली बार हो रहे मेयर पद चुनाव को भी राजनीतिक दलों की अग्नि परीक्षा मानी जा रही है। भीतरीघात से जूझ रही भाजपा ने अपने पुराने कार्यकर्ता संजीव वालिया पर दांव खेला है और इसके जरिए हिंदू मतों को एकजुट करना चाहती है। बसपा ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ की उम्मीद में हाजी फजलुर्रहमान को मैदान में उतारा है और दलितों के बेस वोट के साथ मुस्लिमों को हर हाल में अपने साथ लाना चाहती है। कांग्रेस ने शशि वालिया को मैदान में उतार कर पूर्व विधायक इमरान मसूद के जरिए मुस्लिमों को साधना चाहती है और हिंदू मतों में सेंधमारी की कोशिश है। सपा भी मुस्लिम मतदाताओं के साथ हिंदू मतों को रिझाने में जुटी है। ऐसे में यहां हार जीत के अलावा खुद को साबित करने चुनौती से जूझना पड़ेगा। इस चुनाव के जरिए लोकसभा चुनावों के लिए नेताओं का कद भी आंका जाना स्वाभाविक है। यही कारण है कि निकाय चुनाव को प्रत्याशियों के साथ ही अन्य नेताओं ने खुद से जोड़कर मतदाताओं की खेमेबंदी में जुट गए हैं।
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